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पूर्व जनरलों ने दी मुशर्रफ़ को सलाह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को एक और झटका लगा है और इस बार यह झटका घरेलू मोर्चे पर है. अमरीका उनकी विदेश नीति को लेकर आलोचना कर रहा है. उसका कहना है कि पाकिस्तान की सीमा से अफ़ग़ानिस्तान में घुसनेवाले तालेबान विद्रोहियों को रोकने के लिए वह पर्याप्त क़दम नहीं उठा रहा है. दूसरी ओर भारत ने हाल के मुबंई बम धमाकों में कथित रूप से इस्लामी चरमपंथियों का हाथ होने के लिए उसकी आलोचना की है. अब पूर्व जनरलों और राजनीतिज्ञों और शिक्षाविदों ने उनसे सेना की राजनीति में भूमिका समाप्त करने और सेना प्रमुख और राष्ट्रपति पद को अलग करने को कहा है. स्थानीय अख़बारों में छपे एक पत्र में कहा गया है, '' पाकिस्तान के राष्ट्रपति का पद एक राजनीतिक पद है और इसके साथ सेना के प्रमुख को मिलाने से दोनों पदों का राजनीतिकरण होता है.'' यह पत्र राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राजनीतिक दलों के प्रमुखों को संबोधित किया गया है. इसमें कहा गया है कि अगले साल होनेवाले संसदीय चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हों इसके लिए एक तटस्थ सरकार होनी चाहिए. इसमें टकराव की जगह सहमति का रास्ता अपनाए जाने की बात कही गई है. हालांकि इन माँगों में कुछ भी नया नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक और विपक्षी दल इसको समय समय पर उठाते रहे हैं. लेकिन इन माँगों को पाकिस्तानी सत्ता के क़रीबी लोगों ने उठाया है जिसमें सेना के अवकाशप्राप्त जनरल शामिल हैं. इनमें से कुछ राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के क़रीबी हैं. ‘मुशर्रफ़ से थके’ अख़बारों ने इस पर टिपप्णियाँ की हैं. डॉन का संपादकीय था कि जब ये लोग सत्ता में थे तो उन्होंने अंतरात्मा की आवाज़ क्यों नहीं सुनी. लेकिन इस मुद्दे को उठाने वाले इस टिप्पणी को ख़ारिज़ करते हैं. उनका कहना है कि ये पत्र महीनों की बातचीत का नतीज़ा है. इसके मसौदे पर छह महीने में सहमति हो पाई है. इस पत्र पर हस्ताक्षर करनेवाले राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर हसन असकरी रिज़वी का कहना है, '' यह पत्र इसलिए अहम है क्योंकि विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग इस पर सहमत हुए.'' उनका कहना है, '' ये दिखाता है कि बड़ी संख्या में जनरल अब मुशर्रफ़ प्रणाली से थक गए हैं.'' एक रिटायर्ड जनरल तलत मसूद ने बीबीसी को बताया,'' हमें इस डर ने प्रेरित किया कि यथास्थिति तर्कसंगत नहीं है और ख़तरनाक हो सकती है.'' उनका कहना है,'' हमारी राय है कि यह पाकिस्तान के भविष्य का रास्ता नहीं है.'' बढ़ता टकराव इधर पाकिस्तान में टकराव बढ़ता नज़र आ रहा है.
अगले साल चुनाव से पहले दो प्रमुख विपक्षी दल सेना को राजनीति से बाहर करने के लिए लोकतंत्र के घोषणापत्र पर सहमत हो गए हैं. साथ ही पाकिस्तानी के प्रभावशाली इस्लामी दल राष्ट्रपति को बाहर करने के लिए सड़कों पर उतर आए हैं. साथ ही आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि और बिजली की कटौती को लेकर लोगों की नाराज़गी बढ़ रही है. इन सारे संदर्भ में यह पत्र अहम हो जाता है. यह इस बात का एक और संकेत है कि जनरल मुशर्रफ़ ने सात साल तख्ता पलट कर जो व्यवस्था कायम की थी, उसके ख़िलाफ़ लोग मुखर होने लगे हैं. |
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