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मंगलवार, 18 जुलाई, 2006 को 13:09 GMT तक के समाचार
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लिंग परिवर्तन से परहेज़ नहीं

जयश्री
जयश्री लिंग परिवर्तन कराने के बाद क़ाफी खुश हैं लेकिन वो माँ नहीं बन पाएंगी
आए दिन हम अख़बार में किसी न किसी के लिंग परिवर्तन की ख़बर पढ़ते रहते हैं. अब तक तो यह शहरों तक सीमित था पर अब गाँवों में भी इसका प्रचलन शुरु हो गया है.

अभी हाल ही में गुजरात के बोताड कस्बे के ‘बाबूभाई’ ने अपने आपको ‘जयश्री’ में तब्दील करवा लिया है. आख़िर बाबूभाई को ऐसा करने की क्यों आवश्यकता पड़ी?

इस बारे में प्लास्टिक सर्जन डॉक्टर विजय भाटिया का कहना है, "यह एक तरह का मानसिक रोग होता है जिसमें एक पुरुष यह स्वीकारने को ही तैयार नहीं होता कि वो एक पुरुष है. इस रोग को जेंडर डाएस्फोरिया सिंड्रोम कहते हैं या आम आदमी की भाषा में ‘जेंडर आइडेंटिटी क्राइसिस’ कहते हैं."

उनका कहना है कि इस तरह के लोग मानसिक रूप से काफ़ी पीड़ित होते है क्योंकि समाज उन्हें कुछ समझता है और वो अपने को कुछ और समझते हैं.

इसीलिए उनके ज़ेहन में यह विचार आता है क्यों न अपना लिंग परिवर्तन करा लिया जाए. डॉक्टरों की मानें तो लिंग परिवर्तन करना बहुत ही कठिन काम है क्योंकि इसके कई पहलू है.

लिंग बदलने की ख़ुशी

एंड्रोलॉजिस्ट डॉक्टर कीर्तिपाल विसाना कहते हैं कि ‘इस तरह के ऑपरेशन के लिए वे लोगों को प्रोत्साहित नहीं करते.

 यह एक तरह का मानसिक रोग होता है जिसमें एक पुरुष यह स्वीकारने को ही तैयार नहीं होता कि वो एक पुरुष है. इस रोग को जेंडर डाएस्फोरिया सिंड्रोमम कहते हैं या आम आदमी की भाषा में ‘जेंडर आइडेंटिटी क्राइसिस’ कहते हैं
डॉ भाटिया

उन्होंने बताया, "हो सकता है कि एक छोटे समय के लिए उसमें अपना सेक्स चेंज करवाने की इच्छा जागी हो. पर जब कोई इस ऑपरेशन के लिए बार-बार आग्रह करता है तो हम उसकी मानसिक चिकित्सक से जाँच करवाते हैं कि क्या वो पुरुष मानसकि रूप से महिला है. इसके बाद ही हम ऐसा ऑपरेशन करते हैं."

जहाँ तक जयश्री का सवाल है तो ऑपरेशन के बाद से वो क़ाफी खुश हैं. जयश्री कहती हैं, "मैं शुरू से ही लड़कियों की तरह बर्ताव करती थी और मुझे बहुत बुरा लगता था जब कोई मुझे ताना देता था."

बाबूभाई को जयश्री बनाने के लिए उनके गाँव के लोगों ने ही उनकी मदद की.

जयश्री कहती हैं, "गाँव वालों ने मुझे दस हज़ार रुपए दिए. अब वो मुझे एक महिला की तरह स्वीकार भी कर रहे हैं. मेरे परिवार के लोग क्या समझते हैं उसकी मुझे चिंता नहीं."

नई बहस

जयश्री को बचपन से नृत्य का शौक रहा है और आने वाले दिनों में वो टेलीविज़न सीरियल में काम करना चाहती हैं. पर इस तरह का प्रचलन, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में कितना सही है इस पर नई बहस शुरु हो गई है.

 मैं शुरू से ही लड़कियों की तरह बर्ताव करती थी और मुझे बहुत बुरा लगता था जब कोई मुझे ताना देता था
जयश्री

डॉ भाटिया कहते हैं, "अगर जेंडर आइडेंटिटी क्राइसिस के मरीज़ की समस्या का समाधान न किया गया तो मानसिक रोग एक विकृति बन सकता है." डॉ भाटिया मानते हैं कि इससे जुड़े कुछ सामाजिक पहलू भी हैं.

उनका कहना है, "यह समाज को तय करना है कि क्या ऐसा व्यक्ति शादी कर सकता है. क्या समाज उसे स्वीकार करता है. क्या वो महिला महिला आरक्षण का हक़दार है?"

पर बाबूभाई के जयश्री बनाने के बाद ऐसी क्या चीज़ है जिनमें कोई बदलाव नहीं आ पाएगा? डॉक्टरों का कहना है कि जयश्री कभी माँ नहीं बन पाएंगी.

वैसे जयश्री के समाजिक जीवन में क्या बदलाव आएगा, यह तो वक़्त ही बताएगा.

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