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ढाई आखर नहीं, फ़ोर लेटर लव के | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की, बहुत ख़ूबसूरत मगर सांवली सी, मुझे अपने ख़्वाबों की बांहों में पाकर, कभी नींद में मुस्कुराती तो होगी...' कल्पना में प्रेमिका से संवाद का वह रूमानी दौर अब खत्म हो चला है. अब सूचना और प्रौद्योगिकी का दौर है, जिसमें न केवल प्रेम का अर्थ बल्कि प्रेम की भाषा, उसके प्रतीक, उसकी उपमाएँ और अभिव्यक्तियाँ बदल हुई हैं. मोबाइल फोन है, इंटरनेट है. अब प्रेयसी रात में क्या कर रही है, मुस्कुरा रही हैं, रो रही है, इस सबकी ख़बर आपको एसएमएस पर तत्काल मिल सकती है, चैटिंग से पता चल सकती है. अब रातों को जागने पर घर वाले नाराज़ नहीं होते. पर्सनल स्पेस और टाइम सबका हक़ बन गया है. घरवाले भी सपोर्ट करते हैं. कितना कठिन था कुछ वर्ष पहले तक जब मोबाइल और इंटरनेट नहीं थे. तब प्रेमियों के लिए वह वक़्त बड़ा कठिन होता था जब वे एक दूसरे के साथ नहीं होते थे. यह अलग बात है कि विरह के बाद मिलन का मजा ही कुछ और था लेकिन अब समय किसके पास है. सचमुच प्रौद्योगिकी ने प्रेम की दुनिया को बेहद प्रभावित किया है. इंस्टेंट लव मीडिया विशेषज्ञ और मनुष्य से प्रौद्योगिकी के रिश्तों पर शोध कर रहे सुधीश पचौरी कहते हैं, "प्रौद्योगिकी ने प्रेम को गति प्रदान कर दी है. संप्रेषण की क्षमताएँ बढ़ा दी हैं. प्रेम, प्रेमी और प्रेमिका के बीच जो स्पेस था उसे लगभग खत्म कर दिया है प्रौद्योगिकी ने."
अब तो पहली ही मुलाक़ात में आउटिंग का प्लान बन सकता है, दिलचस्प बात यह है कि त्वरित होते प्रेम ने शहरों, छोटे शहरों और क़स्बों में भी संकोच और पर्दादारी को दरकिनार कर यह घोषणा कर दी है कि ‘ मेरी मर्ज़ी ’ ही चलेगी. दिलचस्प बात है कि युवा पीढ़ी ने सहज रूप से प्रेम की नई भाषा को स्वीकार कर लिया है. अब लड़कियों को भी अपने लिए 'सेक्सी' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाना बुरा नहीं लगता. राजधानी में रहने वाली और जर्नलिज़्म में एमए कर रही रूचि गुप्ता कहती हैं, "इसमें बुरा लगने वाली कोई बात नहीं. लड़के ही नहीं लड़कियाँ भी इसी तरह की भाषा का प्रयोग बेझिझक कर रही हैं." मल्टीमीडिया के प्रथम वर्ष के छात्र अरूण कुमार का कहना है कि बातों को मन में रखने से अच्छा है कह देना. वे कहते हैं, "हम जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह ज्यादा स्टेटफ़ॉरवर्ड है." विदेशी फिल्मों और अब तो हिंदी फिल्मों और उनके गानों ने भी प्रेम की इस नई भाषा को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई है. 'हाय सेक्सी' प्रसिद्ध शायर शहरयार का भी मानना है कि संकेतों, अलंकारों, प्रतीकों की भाषा का स्थान आज सीधे-सीधे देह की भाषा ने लिया है. प्रेम का नया व्याकरण लिख रहे आज के युवा बेधड़क सेक्सी, स्वीटी, बेब, पटाख़ा जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं. पचौरी मानते हैं कि इसका एकमात्र मक़सद स्पष्ट शब्दों में अपनी बात को दूसरे तक पहुँचाना है. यह पैरोडी की भाषा है जो किसी भी अन्य भाषा की तुलना में ज्यादा कम्यूनिकेटिव है. वे कहते हैं, "यह पाखंड की भाषा नहीं है. अगर प्रेमी या प्रेमिका किसी को ‘किस’ करना चाहता है तो वह बड़े साफ़ लफ़्ज़ों में कहेगा, 'कैन आई किस यू?' इसकी वजह भी साफ़ है अब दोनों एक दूसरे को सहज रूप से हर वक़्त उपलब्ध हैं." |
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