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सवाल स्वास्थ्य का, तैयारी पर्यटन की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार का मानना है कि विदेशों से लोगों को भारत आकर इलाज करवाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. इससे देश की स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहतर होंगी और देश 'मेडिकल टूरिज़्म' यानी स्वास्थ्य के लिए पर्यटन से वर्ष 2012 तक 200 करोड़ रुपए कमा सकता है. भारत सरकार का यह विचार तो अच्छा है पर इसके साथ ही एक और सच्चाई भी जुड़ी हुई है और वो है देश भर में अस्पतालों की लचर स्थिति. आज हालत यह है कि भारत सरकार जीडीपी यानी सकल घरेलु उत्पाद का एक फ़ीसदी से भी कम हिस्सा स्वास्थ्य पर ख़र्च करती है जबकि विश्व बैंक की मानें तो यह जीडीपी का पाँच फ़ीसदी हिस्सा होना चाहिए. जन स्वास्थ्य अभियान के डॉक्टर अमित सेन गुप्ता कहते हैं, "भारत में सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र को कभी प्राथमिकता दी ही नहीं. विश्व की सबसे निजीकृत स्वास्थ्य सेवाओं में से एक हमारी है. देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में 85 फ़ीसदी खर्च निजी क्षेत्र में होता है जबकि सरकारी खर्च केवल 15 फ़ीसदी है." सपनों का स्वास्थ्य अब चाहे वो पर्यटन मंत्री हों या स्वास्थ्य मंत्री, भारतीय उद्योग महासंघ हो या इंडियन हेल्थ केयर फ़ेडरेशन, सभी बात कर रहे हैं मेडिकल टूरिज़्म की. मशहूर हृदय रोग विशेषज्ञ और दिल्ली स्थित एस्कॉर्ट अस्पताल के कर्ताधर्ता नरेश त्रेहन इस बारे में बताते हैं, "भारत में दुनिया के सबसे अच्छे अस्पताल हैं. अमरीका जैसे देशों में जिन लोगों के पास चिकित्सा बीमा नहीं हैं वो अपना इलाज करवाने भारत आते हैं क्योंकि यहाँ बहुत सस्ते में और बहुत अच्छे में इलाज हो जाता है." उन्होंने बताया, "यहाँ पर मरीज़ कनाडा और इंग्लैंड से भी आते हैं क्योंकि वहाँ की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में लंबी प्रतीक्षा सूची चलती है. साथ ही दक्षिण एशिया और मध्य एशिया से भी भारत में मरीज़ आते हैं क्योंकि इन देशों में अंतरराष्ट्रीय स्तर की चिकित्सा उपलब्ध नहीं है." यानी अच्छी विश्वस्तरीय सुविधा, दुनिया के सबसे अच्छे डॉक्टर, अच्छे अस्पताल और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरने वाली स्वास्थ्य सेवाएं पेश करके भारत थाइलैंड की तरह बहुत बड़ी संख्या में विदेशी बीमारों को न्यौता देना चाहता है. यह एक खुला निमंत्रण है कि यहाँ के पाँच सितारा अस्पतालों में आइए और अपने देश की तुलना में कहीं कम दामों में स्वस्थ होकर लौट जाइए. पर क्या यह वही भारत है जहाँ ज़िलों, गाँवों और क़स्बों के अस्पतालों की हालत इतनी जर्जर है कि हर तरह के छोटे-बड़े इलाज के लिए मरीज़ों को दिल्ली स्थित आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स पहुँचते हैं. बहस एम्स में गैस्ट्रो इंट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ अनूप सराया इसे विकासशील देशों की विडंबना बताते हैं और कहते हैं कि सरकार आम आदमी के बारे में नहीं, वीआईपी मरीज़ों के बारे में सोचती है.
वे कहते हैं, "यह एक अजीब बात है कि बड़े निजी अस्पतालों को सरकार की ओर से मुफ़्त ज़मीन और कम सीमा शुल्क देकर उपकरण आयात करने की सुविधा सरकार से मिलती है. इसके बदले में इन्हें ग़रीबों का मुफ़्त इलाज करना होता है पर ऐसा हो नहीं रहा. सारी व्यवस्था का लाभ बड़े पूंजीपतियों को हो रहा है, आम आदमी को नहीं." पर मेडिकल टूरिज़्म के पैरोकार डॉक्टर त्रेहन का मानना है कि मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने के प्रयास को आम आदमी की स्वास्थ्य सेवाओं को नज़रअंदाज़ किए जाने के रूप में देखना ग़लत होगा. उनका कहना है कि वैश्वीकरण के दौर में स्वास्थ्य सेवाएँ देश के नागरिकों तक ही सीमित नहीं रह सकतीं. नरेश त्रेहन कहते हैं, "मेडिकल टूरिज़्म आम भारतीयों की कीमत पर नहीं हो रहा है बल्कि इससे स्वास्थ्य सेवाएँ अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनेंगी जिसका लाभ भारतीय नागरिक भी उठा पाएँगे. हालाँकि इसमें खर्च ज़्यादा आता है इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र में अमरीका की तरह बीमा योजना के बारे में सरकार को सोचना चाहिए." डॉक्टर त्रेहन का मानना है कि स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र को व्यापक बनाए जाने से ग़रीब आदमी भी अच्छी स्वास्थ्य सेवा का लाभ उठा पाएगा, जैसा कि अमरीका में होता है. चिंता भारतीय उद्योग महासंघ के साझा शोध के अनुसार भारत में प्रति 2000 लोगों के लिए अस्पतालों में तीन बेड ही उपलब्ध हैं जबकि चीन, ब्राज़ील और थाइलैंड जैसे देशों में यह औसत लगभग नौ बेड का है. यानी इतना तो साफ़ है कि सरकारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर और ज़्यादा धन खर्च करना चाहिए. डॉक्टर अनूप सराया कहते हैं, "कस्बों और छोटे शहरों में अस्पतालों को बेहतर बनाने की ज़रूरत है और सरकार को सकल घरेलु उत्पाद का कम से कम पाँच फ़ीसदी हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में करना चाहिए." पर इस वक़्त तो हालात बिल्कुल उलट नज़र आते हैं. सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने में जुटी है. डॉ अमित सेन गुप्ता करते हैं, "पिछले 10-15 वर्षों में अस्पातालों की हालत और ख़राब हुई है. लगता है कि सरकार स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के जिम्मे छोड़ ख़ुद कुछ नहीं करना चाहती. सरकारी क्षेत्र की बेहतरी की कोई कोशिश नज़र नहीं आ रही." फिलहाल सरकार से सस्ती ज़मीन, मेडिकल उपकरण का सस्ता आयात, सरकार की ओर से प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सो और तकनीक विशेषज्ञों को अपनी और खींच कर निजी क्षेत्र ख़ूब फल-फूल रहा है. वहीं दूसरी ओर सरकारी अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर वहाँ की ज़मीनी सच्चाई से जूझ रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें स्वायत्तता बनाम राजनीतिक दखलंदाज़ी06 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री विवादों के घेरे में09 मई, 2006 | भारत और पड़ोस 'कब मिलेंगे एम्स जैसे अस्पताल?'21 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस विदेशियों को मेडिकल वीज़ा देगा भारत09 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस पर्यटकों को लुभाने की कोशिश11 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस मरीज़ पर्यटकों का रुख़ भारत की ओर30 सितंबर, 2003 को | भारत और पड़ोस दिल के मरीज़ बच्चों का प्रदर्शन07 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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