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'कब मिलेंगे एम्स जैसे अस्पताल?'

मरीज़ों के परिजन
लोगों को इलाज के लिए अपनी बारी आने का महीनों इंतज़ार करना पड़ता है.
"हम इतनी परेशानियों के बावजूद दिल्ली आकर इलाज करा रहे हैं. अगर अपने इलाक़े में ही एम्स जैसा अस्पताल होता तो यहाँ फ़ुटपाथ पर रहकर महीनों अपनी बारी का इंतज़ार क्यों करते. पता नहीं हमारे राज्य में एम्स जैसा अस्पताल कब बनेगा...."

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में घुसते ही वहाँ इलाज कराने आए लोगों से ऐसी कितनी ही बातें सुनने को मिल जाती हैं.

वजह, लोगों को अगर उनके क्षेत्र या राज्य में ही एम्स जैसे संस्थान या सुविधाओं से संपन्न अस्पताल मिलते तो वे दिल्ली आकर इलाज कराने के लिए क्यों मजबूर होते.

पर ऐसा अभी तक क्यों नहीं हो सका, इसका जवाब न तो इन लोगों के पास है और न ही केंद्र सरकार के पास.

सुस्त सरकार

एम्स
सरकार के मुताबिक वर्तमान योजना के लिए क़रीब 45 हज़ार करोड़ रूपए चाहिए.

हालांकि पिछली केंद्र सरकार ने लोगों की इस ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए एक योजना बनाई थी जिसके तहत भारत के उत्तरी राज्यों ख़ासकर बिहार, राजस्थान, पूर्वोत्तर, उत्तर प्रदेश आदि में क़रीब छह एम्स जैसे अस्पताल बनाने की मंशा ज़ाहिर की थी.

पटना सहित कुछ अन्य स्थानों पर शिलान्यास भी कर दिया गया था पर अभी तक अस्पताल तो दूर, कोई भवन तक नज़र नहीं आ रहा है.

इस बारे में जब केंद्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अबुमनि रामडॉस से बीबीसी ने बातचीत की तो उन्होंने इसका ठीकरा पिछली सरकार पर ही फ़ोड़ा.

उन्होंने बताया, "पिछली सरकार ने घोषणा तो कर दी थी पर इसके लिए कोई धनराशि आवंटित नहीं की गई. इसे 10वीं योजना में भी जगह नहीं दी गई इसलिए ऐसे संस्थानों के निर्माण के लिए राशि जुटाना छोटा काम नहीं है."

 ये कोई दो-तीन महीनों में हो सकने वाल काम नहीं है. हम अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं. इसके लिए क़रीब 45 हज़ार करोड़ रुपए की ज़रूरत पड़ेगी.
डॉ. अबूमनि रामडॉस, स्वास्थ्य मंत्री- भारत सरकार

पर लोगों को स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सवालों के लिए कब तक ऐसे और संस्थानों के बनने का इंतज़ार करना पड़ेगा, इसपर स्वास्थ्य मंत्री बोले, "यह कोई दो-तीन महीनों में हो सकने वाल काम नहीं है. हम अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं. इसके लिए क़रीब 45 हज़ार करोड़ रुपए की ज़रूरत पड़ेगी."

स्वास्थ्यमंत्री ने कहा कि वह इस प्रस्ताव को कैबिनेट के सामने रखेंगे और अगले कुछ हफ़्तों या महीनों में कैबिनेट इसे अपनी स्वीकृति दे सकती है.

बुनियादी सवाल

एक अस्पताल
निजी अस्पतालों में इलाज करा पाना आम आदमी की जेब के बाहर की चीज़ है.

महंगे होते इलाज और आम आदमी की पहुँच से दूर होते अस्पतालों की वजह से गंभीर रोगों के इलाज के लिए देश भर से हज़ारो लोग दिल्ली स्थित एम्स में आते हैं.

एम्स में इलाज की दरकार हज़ारों को होती है और यही वजह है कि लोगों को इलाज के लिए अपनी बारी आने का महीनों इंतज़ार करना पड़ता है.

ऐसे में सबसे बेहतर विकल्प तो यह है कि लोगों को उनके क्षेत्रीय मुख्यालयों या राज्यों में ही एम्स जैसी सुविधाओं वाले अस्पताल मुहैया कराए जाएँ.

 अगर बिहार में ही ऐसी सुविधा होती तो दिल्ली में आकर महंगाई और असुविधाओं के बीच इलाज क्यों कराते. जब वहाँ ऐसे सरकारी अस्पताल ही नहीं हैं तो यहाँ आकर मजबूरन इलाज कराना ही पड़ेगा.
दिल्ली में एक मरीज़ के परिजन

बिहार के सहरसा ज़िले से दिल्ली आए प्रो. रुद्रानंद झा बताते हैं, "अगर बिहार में ही ऐसी सुविधा होती तो दिल्ली में आकर महंगाई और असुविधाओं के बीच इलाज क्यों कराते. जब वहाँ ऐसे सरकारी अस्पताल ही नहीं हैं तो यहाँ आकर मजबूरन इलाज कराना ही पड़ेगा."

एम्स के प्रांगण में अपने इलाज का इतज़ार कर रहे लोगों को शायद असली इंतज़ार तो उस दिन का है, जब लोगों को उनके क्षेत्रों में ही एम्स जैसा इलाज मिल सकेगा.

पर क्या पता, लोगों का यह इंतज़ार कब पूरा होगा.

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