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गुरुवार, 06 जुलाई, 2006 को 22:12 GMT तक के समाचार
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स्वायत्तता बनाम राजनीतिक दखलंदाज़ी

एम्स
स्वायत्तता बनाम राजनीतिक दख़लदांज़ी की बहस नए सिरे से शुरु हुई है.

स्वास्थ मंत्री अंबुमणि रामदॉस के कोप के चलते प्रतिष्ठ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉक्टर वेणुगोपाल को बर्खास्त करने की अनुशंसा कर दी गई जिसे मंत्रिमंडलीय समिति की मंजूरी मिलने को ले कर शायद ही किसी को शक हो.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जो स्वायत संगठनों मे किसी किस्म की दख़लादांज़ी के ख़िलाफ अपनी राय प्रकट कर चुके हैं और कुछ मौक़ों पर अपने मंत्रियों को इस तरह की नसीहत भी दे चुके हैं, इस मामले मे खामोश हैं.

सरकार जिस गणित पर टिकी है वो उन्हे ख़ामोश रहने को मजबूर करता है.

आशंका थी

इस मामले से जुड़ी सबसे बड़ी विडंबना ये है कि जो हुआ उसकी आशंका बनी हुई थी.

जब डॉक्टर वेणुपाल ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में राजनीतिक दख़लंदांज़ी का मामला उठाया तो स्वास्थ मंत्री अंबुमणि रामदॉस ने बजाए सफाई देने के वेणुगोपाल को चुनौती दी की अगर वो संस्थान छोड़कर जाना चाहें तो जा सकते हैं.

मानो रामदॉस मंत्री के तौर पर अपनी ताक़त साबित करने की लड़ाई लड़ रहे हों.

डॉक्टर वेणुगोपाल को बर्ख़ास्त करने संबधी प्रस्ताव मे इस फैसले का कारण बताते हुए कहा गया है कि उन्होंने सरकारी पद पर रहते हुए सरकार की सार्वजनिक आलोचना की, जो आचार संहिता के उल्लघंन का मामला बनता है.

इस प्रस्ताव को बहुमत से पास भी कराया गया.

कुल मिला कर सरकार के पास उनकी बर्खास्तगी का क़ानूनी आधार मज़बूत है, जिसे अदालत में चुनौती देना आसान नहीं होगा.

दखलंदाज़ी

लेकिन सवाल ये है कि क्या मामले को इस हद तक ले जाने की आवश्यकता थी?

डॉक्टर वेणुगोपाल कह रहे थे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की स्वायत्ता पर हमला हो रहा है और स्वास्थ मंत्री संस्थान मे गै़र-ज़रुरी हस्तक्षेप कर रहे हैं.

अंबुमणि रामदॉस
कागज़ात बताते हैं कि डॉक्टर वेणुगोपाल के आरोप निराधार नहीं हैं

क्या स्वास्थ मंत्री के लिए तिलमिला कर अपनी नाराज़गी प्रकट करना उचित था या फिर एक परिपक्व राजनितिज्ञ की तरह वो उदारता दिखाते और डॉक्टर वेणुगोपाल को बुला कर पूछते की बताईए परेशानी क्या है.

लेकिन उन्होंने बडप्पन न दिखाते हुए टकराव का रास्ता अपनाया और मौक़े की तलाश में रहे कि कब वो वेणुगोपाल को सबक सिखाएँ.

और ये मौक़ा दिया उन्हें आरक्षण विरोधी आंदोलन ने.

असल में इस आंदोलन ने इस दुनिया भर में प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़ी राजनीति और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई को अंतिम चरण में पहुँचा दिया.

अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिए जाने के ख़िलाफ़ चले आंदोलन का केंद्र बने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के जुनियर डॉक्टरों को काबू करने में स्वास्थ्य मंत्रालय बेबस साबित हुआ था.

इस मुद्दे पर डॉक्टर वेणुगोपाल परोक्ष रुप से आरक्षण विरोधियों के साथ थे, ये सरकार के सामने साफ़ हो चुका था.

इस मुद्दे पर डॉक्टर वेणुगोपाल ने प्रधानमंत्री सहित उन सब लोगों का साथ खो दिया जो शायद उनके उठाए मुद्दों पर उनके साथ खड़े होते और देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान को यूं व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के चलते विवादों में न पड़ने देते.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जिन पर स्वायत्त संस्थानों से जुड़े लोग भरोसा करते हैं कि वो एसे संस्थानों को राजनीतिक चालबाज़ियों से बचा कर रखने में विश्वास करते हैं, रामदॉस उन्हे ये समझाने में सफल रहे की अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान मे सब कुछ ठीक नही चल रहा है.

स्वयं प्रधानमंत्री ने संस्थान में चल रहे मामले की समीक्षा के लिए समिति का गठन किया.

दूसरे तथ्य

तो क्या डॉक्टर वेणुगोपाल एक चालाक दिमाग़ राजनीतिज्ञ के जाल मे फंस गए?

इस मामले को सिर्फ़ यहीं तक देखना शायद इस पूरे मामले को सतही तौर पर देखना होगा. इस मामले से जुड़े कुछ और तथ्यों की पड़ताल की जाए.

आरक्षण विरोधी हड़ताल
आरक्षण विरोधी हड़ताल के समर्थन ने वेणुगोपाल के पक्ष को कमज़ोर किया

डॉक्टर वेणुगोपाल के इस आरोप को साबित करने वाले दस्तावेज़ बीबीसी के पास भी हैं जिनसे साबित होता है कि उनके आरोप निराधार नही हैं.

संस्थान के गेस्ट हाऊस मे उनके लिए सुख-सुविधाएं जुटाने पर पैसा पानी की तरह बहाया गया.

अधिकारियों को पद से हटाने और नियुक्त करने मे स्वास्थ मंत्रालय ने सीधा हस्तक्षेप किया.

आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान कुछ डॉक्टरों के ख़िलाफ कार्रावाई के निर्देश दिए गए.

लेकिन ये भी सच है कि संस्थान के पिछले दो तीन साल में जो गतिविधियाँ रहीं उसमें संस्थान शोध कार्यों के लिए कम और अप्रिय कारणों से ज़्यादा चर्चा में रहा.

कई बड़े और नामचीन डॉक्टर संस्थान छोड़कर निजी अस्पतालों में चले गए.

अधिक पैसा पाने की इच्छा ऐसे डॉक्टरों के फ़ैसले का एक कारण गिनाया जा सकता है. पर सवाल ये भी है कि इन डॉक्टरों के पास ज़्यादा पैसा कमाने और विदेश जाने का मौका हमेशा था पर इस संस्थान में वो बने रहे.

कई डॉक्टरों ने खुले तौर पर डॉक्टर वेणुगोपाल पर निरंकुशता के आरोप लगाए.

डॉक्टर वेणुगोपाल जो आज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में राजनीतिक हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ योद्धा नज़र आ रहे हैं उन पर ही संस्थान के डॉक्टरों को ख़ेमों में बाँटने के गंभीर आरोप हैं.

अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ जूनियर डॉक्टरों को भड़काने के खुले आरोप उनपर लगते रहे हैं.

लेकिन इस सब के बावजूद डॉक्टर वेणूगोपाल का जो योगदान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और चिकित्सा के क्षेत्र मे रहा है, उनके क़द के व्यक्ति से जुड़ी शिकायतों से बेहतर ढंग से निपटा जा सकता था.

उनकी जो भी आलोचना की जा रही हो, लेकिन जो सवाल वो उठा रहे थे, अगर वो निराधार नहीं हैं, तो उनके जवाब भी तलाशने चाहिए.

अगर वो क़ानूनी लड़ाई हार जाते हैं, तो भी.

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