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बच्चे को आख़िर भारतीय कश्मीर जाने की इजाज़त मिली | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अक्तूबर 2005 में भारत और पाकिस्तान में भूकंप के रूप में क़ुदरत के क़हर ने मुज़फ़्फ़राबाद में भारत की नागरिकता रखने वाली महिला और उनके पाकिस्तानी पति की साँसे छीन ली लेकिन उनके ढाई वर्षीय बच्चे की नागरिकता दोनों पड़ोसी देशों की सरकारों के लिए मानो गले की फाँस बन गई. भारत प्रशासित कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के 70 वर्षीय वृद्ध अब्दुल अहद अपने मासूम पोते को साथ ले जाने के लिए तीन महीने से पाकिस्तान में मौज़ूद थे, लेकिन पाकिस्तान और भारत की सरकारें ये तय नहीं कर पा रही थी कि भारतीय माँ से पाकिस्तान में पैदा होने वाले इस बच्चे को किस देश का पासपोर्ट और किस देश का वीज़ा मिलना चाहिए. कई महीनों के इंतज़ार के बाद अख़िर शनिवार को इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास ने बच्चे को भारतीय प्रशासित कश्मीर जाने की इजाज़त दे दी. भारतीय दूतावास ने बीबीसी को बताया कि बच्चे की नागरिकता के बारे में जाँच नहीं की जाएगी और उन्हें एक आपात सर्टीफ़िकेट जारी किया जाएगा ताकि वे भारतीय प्रशासित कश्मीर जा सकें. किधर जाएँ इस भूकंप में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद के रहने वाले मोहम्मद इसहाक़ और बेगम फ़ातिमा इसहाक़ की मौत हो गई थी जबकि उनका पाँच वर्षीय बेटा सदीस इसहाक और ढाई वर्षीय मुईज़ इसहाक ज़िंदा बच गए थे. अब्दुल अहद ने बताया कि उनका बेटा इसहाक़ 1996 में श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद आ गया था और उसने भारतीय नागरिकता छोड़ कर पाकिस्तानी नागरिकता ले ली थी.
श्रीनगर की रहने वाली फ़ातिमा अपने संबंधियों से मिलने जब मुज़फ़्फ़राबाद आई तो इसहाक़ के साथ वर्ष 2000 में शादी हो गई और गर्भवती हो जाने के बाद 2001 में वह श्रीनगर वापस चली गई जहाँ उसने सदीस को जन्म दिया. फ़ातिमा 2002 में सदीस के पासपोर्ट के सहारे दोबारा मुज़फ़्फ़राबाद आई और अपने पति के साथ रहने लगी. यहीं उसने अपने दूसरे बेटे मुईज़ को जन्म दिया. अहद ने बताया पहले बताया था कि पाकिस्तानी अधिकारियों से संपर्क करने पर पता चला कि उनके बड़े पोते सदीस के पासपोर्ट की मियाद ख़त्म हो चुकी है और छोटे पोते मुईज़ की नागरिकता ही तय नहीं है. काफ़ी कोशिशों के बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें अपने पोतों को वापस ले जाने की अनुमति दे दी है, लेकिन इसके बाद उन्हें भारतीय उच्चायुक्त से जवाब का इंतज़ार था. अहद का दर्द ढाई वर्षीय मुईज़ माता-पिता को खोने के बाद अपने मामू के साथ रहते हैं. बीबीसी से मुलाक़ात के दौरान भी वह दादा से दूर ही दिखे और मामू की गोद में बैठे रहे. इस पर अहद ने कहा कि छोटा बच्चा है, शुरू में वापस श्रीनगर जा कर रोएगा लेकिन बाद में ठीक हो जाएगा.
अहद ने कहा कि पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर की समस्या अपनी जगह है लेकिन वह तो सिर्फ़ इतना जानते हैं कि अक्तूबर के भूकंप में न तो उनका बेटा रहा और न ही बहू. अब उनकी निशानी ये दो पोते हैं और उन्हें इस बात से कोई ग़रज़ नहीं कि उन बच्चों का पासपोर्ट और वीज़ा किस देश का है, लेकिन जिस तरह भी संभव हो वह उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए बेताब हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें डरा, सहमा सा यह बचपन30 जून, 2005 | भारत और पड़ोस कई दिन बाद, दो बच्चे जीवित पाए गए14 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'भूकंप में 17 हज़ार बच्चों की मौत'31 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस लाखों बच्चे भूखे सोते हैं: यूनिसेफ़02 मई, 2006 | पहला पन्ना संतान विहीन या संतान मुक्त!01 अप्रैल, 2006 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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