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डरा, सहमा सा यह बचपन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त अरब अमीरात से वे 22 बच्चे पाकिस्तान वापस आए हैं जिन्हें ऊँट की सवारी के खेल के लिए इस्तेमाल किया जाता था और अब उनका मनोचिकित्सा के ज़रिए इलाज चल रहा है. ये बच्चे बुरी तरह सहमे हुए हैं लेकिन उन दिनों के बारे में खुल कर बोलने लगे हैं. दस साल का शौकत अपनी उम्र के आठ साल अबू धाबी में गुज़ार चुका है. वह बताता है, "मैं रात को ग्यारह बजे सोता था और सुबह चार बजे उठा दिया जाता था. मेरे कमरे में एक और लड़का और चार ऊँटों की देखभाल करने वाले लोग रहते थे और वहाँ बहुत गरमी होती थी". शौकत कहता है कि उसे सुबह नाश्ते में एक टोस्ट और चाय और फिर दिन भर में थोड़ी से दाल और चावल खाने को दिए जाते थे. इन बच्चों की ज़िंदगी में बस दो ही काम थे. रेस में हिस्सा लेना और बाक़ी समय ऊँटों की देखभाल करना. मोहम्मद याक़ूब की उम्र चौदह साल है हालाँकि देखने में वह दस साल का ही लगता है. वह कहता है, "मेरे मालिक को हम बच्चों से ज़्याद ऊँटों से लगाव था". ये बच्चे अपने जिस्म पर पड़े वे निशान दिखाते हैं जो ऊँटों पर से गिरने से लगी चोटों के कारण पड़े. याक़ूब का कहना है, "मुझे शुरू में गिरने से डर लगता था लेकिन बाद में नहीं. गिरने के बाद अगर कोई हड्डी नहीं टूटी हो तो फिर से दौड़ में हिस्सा लेना पड़ता था". ये बच्चे शायद ही कभी अस्पताल ले जाए जाते हों क्योंकि फिर इस बात की पोल खुल जाती कि वे किस तरह के काम कर रहे हैं. बच्चों के कल्याण के लिए काम कर रहे एक ग़ैर सरकारी संगठन के ज़ुबैर अहमद शाह ने बीबीसी से कहा कि कई बार माँ-बाप पैसे के लालच में अपने बच्चों के एजेंटों के हाथों बेच देते हैं. पाकिस्तान में कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें इस काम के लिए अपने बच्चों को भेजने पर 250 से 350 दिरहम प्रति मास का भुगतान होता है. शाद का कहना है, "इस काम के पीछे हमेशा ग़रीबी ही नहीं होती, कई बार लालच भी होता है". ये बच्चे इस समय एक आश्रय में रह रहे हैं. इनके माता-पिता सज़ा के डर से सामने नहीं आ रहे हैं और अधिकारियों को चिंता है कि कैसे उन्हे तलाश कर के इन बच्चों को उनके सुपुर्द किया जाए. |
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