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बागान से विधानसभा तक का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
‘इलाके के चाय बागान धीरे- धीरे बंद हो रहे हैं. उनमें काम करने वाले मज़दूर बेहाल हैं. मैंने भी यह दर्द भोगा है. इसलिए विधानसभा में यह मुद्दा उठाऊंगी.’ यह कहते हुए सुखमईत उराँव की आँखों में चमक आ जाती है. आख़िर यह सुखमईत हैं कौन? वे कल तक पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के मोगलकाटा चाय बाग़ान में चाय के पत्ते तोड़ती थीं और हाल में हुए विधानसभा चुनाव में माकपा की टिकट पर जीत कर वो विधायक बनी हैं. जिस नागराकाटा सीट से वे जीती हैं वहां वे ‘पीटींग दीदी’ के नाम से मशहूर हैं. सुखमईत उरांव पुराने दिनों की याद करते हुए कहती हैं, '' पिता बलिराम उरांव भी चाय बागान मज़दूर थे. लेकिन बचपन में ही उनकी मौत हो जाने के कारण पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई. मैंने पढ़ाई छोड़ कर पत्ते तोड़ने का काम शुरू कर दिया.'' सुखमईत बताती है कि कई दिन ऐसे भी बीते हैं जब दो जून भरपेट भोजन नहीं मिला और जिम्मेवारियों के बोझ से दबे रहने के कारण उन्हें शादी के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली. वैसे, सुखमईत को राजनीति विरासत में मिली है. उनके पिता आपातकाल के दौरान कई बार जेल गए थे. उस समय महज 10-11 साल की होने की बावज़ूद वह ट्रेड यूनियन की सभाओं में शिरकत करती थीं. जिस नागराकाटा इलाके से वो जीती हैं, वहां 42 चाय बागान हैं और अधिकतर की हालत बदतर है. उम्मीदें मोगलकाटा चाय बागान के मज़दूर कॉलोनी के जिस दो कमरे के मकान में उनका परिवार रहता है, वहाँ बिजली नहीं है और प्रबंधन की ओर से बिल का भुगतान नहीं होने के कारण बिजली काट दी गई है. माकपा की नागराकाटा जोनल समिति के सचिव अमल प्रसाद राय बताते हैं, "सुखमईत का पूरा जीवन संघर्ष में गुजरा है. उसने चाय बागान का यथार्थ भोगा है. इसलिए जीतने के बाद वह इस उद्योग की समस्याओं पर जरूर ध्यान देगी." उराँव माकपा और बागान मज़दूरों के विभिन्न संगठनों से जुड़ी रही हैं और ख़ुद मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य उनके समर्थन में चुनाव प्रचार के लिए गए थे. पीटींग दीदी के विधायक बनने से इलाक़े के मज़दूरों में उम्मीद की एक नई किरण पैदा हुई है. नागराकाटा चाय बाग़ान के बुधिया उराँव कहते हैं, “दीदी हमारे बीच की हैं. इसलिए हमारा हाल जानती हैं. वे हमें निराश नहीं करेंगी.” जाहिर है इस जीत से पीटींग के कंधों पर उम्मीदों का बोझ बढ़ गया है. अब तक अपना परिवार पालने के लिए संघर्ष था, अब सुखमईत ने बंद होते बागानों के खिलाफ़ नए सिरे से संघर्ष की पहल करनी है. | इससे जुड़ी ख़बरें चाय उत्पादन पर संकट के बादल06 फ़रवरी, 2004 | कारोबार चाय बागानों के मज़दूर बेहाल 07 नवंबर, 2003 | कारोबार ठंडा पड़ रहा चाय उत्पादन10 अक्तूबर, 2002 | पहला पन्ना पश्चिम बंगाल, केरल में वाम मोर्चा11 मई, 2006 | भारत और पड़ोस केरल और बंगाल में लाल की लहर12 मई, 2006 | भारत और पड़ोस बदल गया है नक्सलबाड़ी का चेहरा26 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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