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गुरुवार, 11 मई, 2006 को 20:32 GMT तक के समाचार
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यूपीए पर वामपंथी दलों का दबाव बढ़ेगा

वामपंथी नेता
वामपंथी नेता सरकार की आर्थिक नीतियों से ख़ुश नहीं हैं
विधानसभा चुनावों में भारी जीत ने एक बार फिर काँग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और वामपंथी दलों के रिश्तों पर सबका ध्यान केंद्रित कर दिया है.

चुनाव के पहले वामपंथी दलों ने यह बार बार साफ़ किया कि चुनाव के बाद वे यूपीए सरकार के साथ रिश्तों को फिर से परिभाषित करने की कोशिश करेगी.

इसकी वजह यह है कि आर्थिक नीतियों और विदेश नीति पर वामपंथी यूपीए सरकार के चाल और चरित्र से नाराज़ हैं.

उनका मानना है कि यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियाँ पिछली एनडीए सरकार से भिन्न नहीं हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी बर्धन कहते हैं कि यूपीए सरकार भी समाज के समृद्ध वर्ग को ध्यान में रखकर सरकार चला रही है.

 समृद्ध वर्ग को खुश रखने के लिए आर्थिक निर्णय लिए जा रहे हैं. चाहे वह मुंबई और दिल्ली हवाई अड्डों के निजीकरण का सवाल हो या खुद्रा क्षेत्र में बड़ी विदेशी कंपनियों को लाने का प्रयास
एबी बर्धन

वे कहते हैं, "समृद्ध वर्ग को खुश रखने के लिए आर्थिक निर्णय लिए जा रहे हैं. चाहे वह मुंबई और दिल्ली हवाई अड्डों के निजीकरण का सवाल हो या खुद्रा क्षेत्र में बड़ी विदेशी कंपनियों को लाने का प्रयास."

वामपंथी कहते हैं यह न केवल साझा न्यूनतम कार्यक्रम के ख़िलाफ़ हैं बल्कि आम जनता के हक में भी नहीं है.

पिछले दो सालों में वामपंथियों के दबाव में यूपीए सरकार को कई मुद्दों पर पीछे हटना पड़ा. चाहे योजना आयोग में विश्व बैंक का हस्तक्षेप, बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में विदेशी विनिवेश बढ़ाने के प्रयास हो या बीएचईएल के निजीकरण का मामला. इन सभी मुद्दों पर वामपंथियों का दबाव रंग लाया.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता निलोत्पल बसु का कहना है कि यूपीए गठबंधन को समर्थन देकर वामपंथी न केवल बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को मज़बूत होने से रोका है बल्कि यूपीए सरकार को भी कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए मजबूर किया.

वे कहते हैं कि रोज़गार गारंटी कार्यक्रम और सूचना का अधिकार दो ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय हैं जिन्हें यूपीए सरकार को वामपंथियों के दबाव में लेना पड़ा.

वामपंथी नेताओं का यह भी दावा है कि उनके हस्तक्षेप के चलते पिछले दो साल में पेट्रोल और डीज़ल आदि की कीमतें कम बढ़ी हैं. उनका कहना है कि यही दबाव अब भी भारत सरकार को तेल की कीमतें न बढ़ाने में काम आएगा.

बढ़ेगा दबाव

केरल और पश्चिम बंगाल की जीत का सहारा लेकर वापमंथी यूपीए सरकार पर अपना दबाव और बढ़ाएंगे.

मनमोहन सिंह
यूपीए सरकार पर साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर ही चलने का दबाव बना रहेगा

वामपंथी दल कृषि क्षेत्र, अनुसूचित जनजातियों के हकों पर क़ानून, खेत मज़दूर और ट्रेड यूनियन के दायरे के बाहर मज़दूरों के हक की लड़ाई में आगे रहेंगे.

श्रमिक क़ानून को उदार बनाने की औद्योगिक क्षेत्र की पुरानी माँग पर हाल ही में मनमोहन सिंह सरकार ने कार्यान्वित करने की बात की थी. साथ ही वित्त मंत्री पी चिदम्बरम बीमा और बैंकिग क्षेत्रों में विदेशी विनिवेश को बढ़ाए जाने का समर्थन कर रहे हैं जबिक वाणिज्य मंत्री कमलनाथ खुद्रा क्षेत्र को वॉलमार्ट जैसी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोले जाने का समर्थन कर रहे हैं.

लेकिन विधानसभा के चुनावों के बाद इन मंत्रियों को आर्थिक सुधार की गति बढ़ाने में बहुत मुश्किल होगी. सरकार और वामपंथी दलों के बीच नोक झोंक और बढ़ेगी और लेन देन पर झगड़ा होगा क्योंकि वामपंथियों के सामने उनकी विचारधारा को लेकर कुछ मजबूरियाँ हैं.

दुविधा

1996-98 में वामपंथियों ने संयुक्त मोर्चा सरकार को समर्थन दिया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ सदस्य केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल हुए मगर उस अनुभव से वामपंथी खुश नहीं हैं. उनका मानना है कि वे सत्ता में हिस्सेदारी तब ही लेंगे अगर वे उसकी नीति निर्धारित कर सकें.

वामपंथी कार्यकर्ता

चूंकि वामपंथी धर्मनिरपेक्ष ताकतों को मज़बूत करना चाहते हैं इसलिए कॉग्रेस को केंद्र में समर्थन देना उनके लिए एक तरह की मजबूरी भी है.

यह वामपंथियों के सामने एक बड़ी दुविधा है.

संयुक्त मोर्चा की सरकारों के अनुभव के बाद वे तीसरा मोर्चा रातों रात बनाने के ख़िलाफ़ हैं.

इसलिए आने वाले महीनों में वामपंथी एक तरफ यूपीए सरकार की लगाम खींचकर रखेंगे वहीं दूसरी तरफ गैर बीजेपी और गैर काँग्रेस ताकतों को नीति के आधार पर साथ लाने की कोशिश में जुटेंगे.

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