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गुरुवार, 11 मई, 2006 को 14:10 GMT तक के समाचार
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न कोई विरोध न नाराज़गी

केरल
केरल में सरकार से कोई विरोध नज़र नहीं आया
केरल के मतदाताओं ने एक बार फिर कुछ वैसा ही निर्णय लिया जिसके लिए वे जाने जाते है.

राज्य की 140 सीटों में से 98 सीटों पर एलडीएफ़ ने जीत हासिल की है जबकि 42 पर यूडीएफ़ जीता है.

कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे को बाहर का रास्ता दिखा कर केरल के मतदाताओं ने सीपीएम नेतृत्व वाले वाम गठबंधन को केरल की सत्ता सौंपी है.

केरल में इस बार न तो सरकार के प्रति किसी तरह का विरोध था और न ही राज्य के मुख्यमंत्री उमन चांडी से कोई नाराज़ था.

 मेरा मानना है कि वीएस ही मुख्यमंत्री बनेंगे. हालांकि सीपीएम पोलित ब्यूरो दिल्ली में 13 मई को इस बारे में कोई निर्णय लेगा पर मेरा मानना है कि पोलित ब्यूरों के पास और कोई चारा नहीं है, चाहे पार्टी में उनके विरोधी ऐसा चाहें या न चाहें."
गौरीदासन नायर

हां, मगर इस बार ऐसा लगा कि जनता किसी एक व्यक्ति को अपना नेता बनाना चाहती है और वो हैं सीपीएम के 82 वर्षीय नेता वीएस अच्युतानंदन जिन्हें यहाँ लोग वीएस कहते हैं.

हालांकि अच्युतानंदन को उनकी पार्टी का ही एक धड़ा चुनाव नहीं लड़वाना चाहता था और पार्टी सचिव पिनरई विजयन से उनकी दूरियाँ भी जगजाहिर हैं.

वीएस अपना चुनाव 20 हज़ार मतों से जीते हैं.

द हिंदु अख़बार के विशेष संवाददाता गौरीदासन नायर मानते हैं कि राज्य में वाममोर्चा जीता है पर असली लड़ाई तो अब है.

नायर कहते हैं, "मेरा मानना है कि वीएस ही मुख्यमंत्री बनेंगे. हालांकि सीपीएम पोलित ब्यूरो दिल्ली में 13 मई को इस बारे में कोई निर्णय लेगा पर मेरा मानना है कि पोलित ब्यूरों के पास और कोई चारा नहीं है, चाहे पार्टी में उनके विरोधी ऐसा चाहें या न चाहें."

 मुसलमानों को आशा है कि वामदल की सरकार में उनके हितों का ज़्यादा ख़्याल रखा जाएगा और उनके विकास की ओर ध्यान दिया जाएगा
ओ अब्दुर्रहमान

वहीं पहली बार वामदल ने राज्य के लगभग 24 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कोशिश की.

जमात-ए-इस्लामी के ओ अब्दुर्रहमान ने कहा कि मुसलमानों के एकमुश्त वोट कांग्रेस को न मिलने से भी नतीजे प्रभावित हुए है. ख़ासतौर पर उत्तरी केरल की या मालाबार क्षेत्र की जिन 70 सीटों पर यूडीएफ़ का कब्ज़ा था, उसमें से इसबार वो गठबंधन केवल आठ सीटें ही जीत पाया है.

उन्होंने बताया, "इस क्षेत्र से यूडीएफ़ के पीके कुन्हालीकुट्टी जैसे कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए हैं. मुसलमानों को आशा है कि वामदल की सरकार में उनके हितों का ज़्यादा ख़्याल रखा जाएगा और उनके विकास की ओर ध्यान दिया जाएगा."

चुनाव में मुख्य मुद्दा विकास रहा. जहां दोनों गठबंधनों ने विकास की दुहाई दी वहीं शायद मतदाता ने इस बात की ओर संकेत दिया है कि वो वीएस की राह पर चलना चाहते हैं. यानी वामदल जिस तरह के विकास की बात कर रहे हैं, आम लोग उससे सहमत हैं.

नायर कहते हैं, "केरल की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है और यहां विदेशों से बहुत धन आता है इसलिए लोग विकास, सहुलियत और रोज़गार चाहते हैं. केरल में पढ़े-लिखे बेरोज़गारों की संख्या भी बहुत है. यहां सवाल था विकास प्रक्रिया में पारदर्शिता का. साथ ही पिछले कुछ समय में कृषि संकट भी बहुत गहराया है. इसका असर किसानों और मध्य वर्ग पर पड़ा है क्योंकि यह तबका अपने बच्चों को महंगे व्यावसायिक कॉलेजों में पढ़ने भेजते हैं."

यानी विपक्ष में रहकर चाहे जो भी बयान दिए गए हों, सत्ता में पहुँचे वाम गठबंधन को औद्योगिक विकास और नई अर्थव्यवस्था क़ायम करनी होगी.

कम से कम जनता का मत तो यही कहता है.

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