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सोमवार, 24 अप्रैल, 2006 को 09:24 GMT तक के समाचार
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नाखून से क़ुरान लिखने का प्रयास

नाखून से क़ुरान
अब्दुल अज़ीज़ ख़ान नाखून से क़ुरान लिख रहे हैं
अगर इंसान ठान ले तो कुछ भी कर पाना नामुमकिन नहीं है. यही साबित कर रहे हैं भोपाल के 71 वर्षीय अब्दुल अज़ीज़ ख़ान जो नाखून से क़ुरान को लिख रहे हैं.

अब्दुल अज़ीज़ ख़ान नाखूनों के ज़रिए किसी भी तरह की आकृति कागज़ पर उकेर लेते हैं, चाहे वो कोई चित्र हो या लिखावट.

इस कला की शुरुआत उन्होंने मात्र 17 साल की उम्र में की थी. और इसमें महारथ हासिल करने में उन्हें लगभग 40 साल का लंबा अरसा लग गया है.

काफ़ी वक्त तक वो अपने नाखूनों के ज़रिए चित्र बनाया करते थे. एक दिन उन्हें इस बात का ख्याल आया कि क्यों न इसके ज़रिए कुछ ऐसा किया जाए जो दुनिया में नायाब हो.

बस तभी उन्होंने नाखूनों के ज़रिए क़ुरान लिखने की ठानी. उन्हें इस बात की जानकारी तो थी कि न तो दुनिया में इस तरह का क़ुरान है और न ही इस तरह की कोशिश पहले की गई है.

अब्दुल अज़ीज़ ख़ान पोस्टकार्ड साइज़ के कागज़ों पर क़ुरान लिख रहे हैं जो करीब साढे तीन इंच लंबा और पांच इंच चौड़ा होता है. जिससे लिखावट उभर कर आए और आसानी से पढी जा सके.

अभी तक उन्होंने क़ुरान के तीस सिपारों में से चौबीस सिपारे लिख लिए हैं. उनका कहना है कि एक सिपारे लिखने में लगभग चार महीने लग जाते हैं.

एक कागज़ पर मुश्किल से क़ुरान की एक ही आयात लिखी जा सकती है. क़ुरान लिखने के लिए अब्दुल अज़ीज़ ख़ान ने सुबह के चार घंटे अपने लिए मुकर्रर किए हैं.

मुश्किल काम

उनका मानना है कि इस काम में उंगलियों के साथ-साथ आपके दिमाग़ की भी कसरत होती है. इस काम को एक ही स्ट्रेच में काम करना पड़ता है. इसमें सुधारने की गुंजाइश नहीं होती.

उनका कहना है कि पूरा क़ुरान लिखने में अभी क़रीब दो साल और लग सकते हैं. उनका इरादा है कि इस क़ुरान को सऊदी दूतावास को तोहफे के तौर पर इसे देने का.

वहाँ पर पहले से ही लगभग पचास किस्म के लिखे हुए क़ुरान मौजूद हैं. अब्दुल अज़ीज़ के इस काम में उनके घरवालों की भी पूरी मदद हासिल हो रही है.

यही वजह है कि उनके बच्चे भी अब नाखूनों के ज़रिए लिखना सीख गए हैं. अब्दुल अज़ीज़ का इरादा इस कला के ज़रिए दुनिया में नाम कमाना है.

वो क़ुरान लिखकर लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्डस् में अपना नाम देखना चाहते हैं. उन्होंने नाखूनों के ज़रिए इससे पहले विश्व के कई नेताओं की तस्वीरें भी बनाई हैं.

उनका कहना है कि अभी तक उन्होंने इस कला के ज़रिए पैसा नहीं कमाया है. उनकी ख्वाहिश बस अपने नाखूनों से लिखे क़ुरान को मुकम्मल करने की है जिसमें वो जी जान से जुटे हैं.

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