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राजशाही के ख़िलाफ़ भारत में भी प्रदर्शन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के रामलीला मैदान पर रविवार को जब देश के क़रीब आठ राज्यों से हज़ारों की तादाद में नेपाल मूल के लोग इक्ट्ठा हुए तो सभी की ज़बान पर एक ही नारा था, 'राजशाही मुर्दाबाद'. नेपाल में पिछले कुछ दिनों से राजशाही के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों को समर्थन देने के लिए इस रैली का आयोजन किया गया था. धूलभरी हवा और तेज़ धूप में इस रैली में पहुँचे ये लोग, नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के समर्थन में एकत्र हुए और इन्होंने कई तरीकों से वर्तमान राजशाही के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई. पुतला फूँकने से लेकर पारंपरिक वाद्यों के साथ गाते-बजाते ये प्रदर्शनकारी रामलीला मैदान पहुँचे और कहीं तेज़ नारों तो कहीं क्रांतिकारी गीतों से अपनी बात रखी. रैली का आयोजन नेपाल जनाधिकार सुरक्षा समिति, नेपाल संघर्ष समिति जैसे क़रीब 12 संगठनों और बुद्धिजीवियों के एक संयुक्त मंच, राजतंत्र विरोधी संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा ने किया था. लोकतंत्र बनाम राजशाही पर आख़िर राजशाही का इतना विरोध क्यों हो रहा है? नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के स्थायी समिति के सदस्य और नेपाल सरकार में मंत्री रह चुके झलनाथ खनाल बताते हैं, "नेपाल की प्रगति, वहाँ शांति बहाली और लोकतंत्र की स्थापना जैसे तमाम सवालों पर सबसे बड़ी बाधा है वहाँ की राजशाही. इसको हटाना ही दो करोड़ 50 लाख की आबादी वाले नेपालियों के हक़ में है." आयोजकों के मुताबिक रैली को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी सहित भारत के कई राजनीतिक दलों का समर्थन मिला है.
रैली को समर्थन देने पहुँचे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता, सीताराम येचुरी ने कहा कि नेपाल हो या कोई और देश, लोकतंत्र की स्थापना के लिए लड़ रहे लोगों को हर जगह समर्थन दिया जाएगा. जब उनसे पूछा कि क्या उनकी पार्टी नेपाल में लोकतंत्र की बहाली के सवाल को भारतीय संसद में उठाएगी, सीताराम ने कहा, "हम नेपाल का सवाल संसद में उठाएंगे और हमने यह सवाल उठाया भी है. हमारे प्रयासों के बाद ही नेपाल को शस्त्रों की आपूर्ति रोक दी गई है." रैली में कई समाजवादी नेता, पत्रकार, लेखकों, साहित्यकारों और छात्र संगठनों ने भी हिस्सा लिया. असर नेपाल जनाधिकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष, लक्ष्मण पंत से बीबीसी ने पूछा कि क्या भारत में हो रही इस रैली का नेपाल के घटनाक्रम पर कोई असर पड़ेगा. इस बाबत पंत बताते हैं, "निश्चित रूप से इसका असर पड़ेगा. नेपाल की राजशाही को जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिला हुआ है, अगर वह समाप्त कर दिया जाए तो एक दिन में राजशाही का ख़ात्मा हो सकता है. हमारे इन प्रयासों से नेपाल में लोकतंत्र की बहाली की कोशिशों को अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल होगा." अंदोलनकारियों और नेपाल में लोकतंत्र की बहाली की कोशिशों को समर्थन दे रहे लोगों का कहना है कि अब लड़ाई अपने अंतिम चरण में है. हाँ, मगर अपने लोकतांत्रिक हक़ के लिए संघर्ष कर रहे एक आम नेपाली के लिए नेपाल में लोकतंत्र की बहाली का यह सपना कब पूरा हो सकेगा, यह सवाल अभी भी अपना अंतिम पड़ाव खोज रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें नेपाल में एक प्रदर्शनकारी की मौत08 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस सैकड़ों ने कर्फ़्यू का उल्लंघन किया, झड़पें जारी08 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस काठमांडू में कर्फ़्यू, मोबाइल फ़ोन बंद08 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस नेपाल में विरोध प्रदर्शनों के दौरान झड़पें07 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस नेपाल में हिंसा, दस की मौत06 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस आम हड़ताल से पहले नेपाल में गिरफ़्तारी05 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस सरकार ने 'संघर्षविराम' को ख़ारिज किया04 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस 'संविधान सभा बने तो हथियार छोड़ेंगे'16 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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