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चुनाव आयोग ने आरक्षण पर जवाब माँगा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चुनाव आयोग ने मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह से केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण के प्रस्ताव पर जवाब तलब किया है. चुनाव आयोग का कहना है कि अर्जुन सिंह की घोषणा पाँच राज्यों में विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र पहली नज़र में चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन लगती है. चुनाव आयोग ने कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी को पत्र लिखा है और उनसे कहा है कि वो मानव संसाधन मंत्रालय से इस बात का स्पष्टीकरण लेकर सोमवार तक आयोग को सौंपे. मानव संसाधन मंत्रालय ने अन्य पिछड़ी जातियों के आरक्षण को बढाकर 27.5 फ़ीसदी करने का प्रस्ताव किया है. यह प्रस्ताव विधानसभा चुनावों के बाद प्रभावी होगा पर इस पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. लेकिन इस विरोध को ख़ारिज करते हुए केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने कहा है, "संविधान संशोधन को संसद में लगभग सर्वसम्मति से पारित किया गया था और सरकार संसद और संविधान से बंधी हुई है." प्रावधान केंद्रीय उच्च शिक्षा संस्थानों में इस समय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए (22.5 प्रतिशत) आरक्षण का प्रावधान है. अब सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान करना चाहती है. लेकिन इस प्रस्ताव की ख़बरें आते ही देश में विरोध शुरू हो गया है. छात्र संगठनों के अलावा कई बुद्धिजीवियों ने इसका विरोध किया है. उनका कहना है कि इससे उच्च वर्ग के योग्य छात्रों के रास्ते बंद हो जाएँगे. ग़ौरतलब है कि शिक्षा और नौकरियों में पिछड़े वर्ग के आवेदकों को आरक्षण देने की शुरुआत 15 साल पहले मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के साथ हुई थी. उस समय देश भर में इसका विरोध हुआ था और छात्रों के आक्रामक आंदोलन भी हुए थे. |
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