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शुक्रवार, 07 अप्रैल, 2006 को 17:00 GMT तक के समाचार
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एड्सःउत्तर भारत पर ध्यान ज़रूरी

भारत में एड्स की रोकथाम के लिए एक विज्ञापन
भारत में एड्स की रोकथाम के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं
भारत में एड्स बीमारी का सबसे पहला मामला 1986 में चेन्नई में सामने आया.

अगले ही साल भारत सरकार ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन यानी नैको का गठन किया.

नैको के अनुसार वर्ष 2004 तक इस रोग के वायरस एचआईवी से संक्रमित लोगों की संख्या 51 लाख थी और पिछले साल तक भारत में एक लाख 11 हज़ार लोगों को एड्स हो चुका था.

एड्स का पहला मामला सामने आने के बाद से ही सरकारी और ग़ैर सरकारी स्तर पर बीमारी की रोकथाम के प्रयास जारी हैं.

एड्स अभी तक एक बड़ी चुनौती बनी हुई है लेकिन बीच में कुछ आशा की जोत भी दिखाई देती है.

 भारत में ना तो ज़्यादा जाँच हुई है ना ही जागरूकता के लिए वैसे काम किया गया है, वहाँ साक्षरता भी कम है और स्वयंसेवी संस्थाएँ भी कम हैं वहाँ
अंजलि गोपालन, नाज़ फ़ाउंडेशन ट्रस्ट

भारत में एड्स का पता चलने के 20 साल बाद ऐसी ही आशा की एक जोत दिखी है एक सर्वेक्षण से. इसे कनाडा के टोरंटो स्थित संस्थान ग्लोबल हेल्थ एंड फ़ैमिली वेलफ़ेयर और चंडीगढ़ स्थित पीजी स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ ने मिलकर कराया जिसे लैंसेट नाम पत्रिका में प्रकाशित किया गया है.

सर्वेक्षण ये कहता है कि दक्षिण भारत में पिछले पाँच वर्षों में 15-24 वर्ष के आयुवर्ग में एचआईवी से संक्रमित होनेवाले लोगों की संख्या में 33 प्रतिशत यानी एक तिहाई की कमी आई है.

लेकिन उत्तर भारत में स्थिति ना तो बेहतर हुई है और ना ही बदली है.

सर्वेक्षण पर भारत में मिली-जुली प्रतिक्रिया आई है. एड्स की रोकथाम से जुड़े अभियान से जुड़े लोग मोटे तौर पर तो सर्वेक्षण से सहमत हैं लेकिन उन्हें लगता है कि इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए.

मिली-जुली प्रतिक्रिया

बंगलौर स्थित स्वयंसेवी संस्था फ़्रीडम फ़ाउंडेशन के डॉक्टर अशोक राव कहते हैं कि इस संकट को उत्तर-दक्षिण के खाँचे में बाँटकर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि कुछ राज्यों में व्यवस्था अच्छी है, कुछ में नहीं.

 ये एचआईवी से ग्रसित लोगों में कमी आने की शुरूआत है और अगर उत्तर भारत में भी उसी तरह से ध्यान दिया गया जैसा कि दक्षिण भारत में हुआ तो वहाँ भी अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं
डॉक्टर राजेश कुमार, पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़

डॉक्टर अशोक राव के अनुसार,"दक्षिण भारत में जो हेल्थ सेंटर हैं वहाँ तो दिल्ली-राजस्थान-पंजाब के लोग आते हैं..बिहार-यूपी के बारे में तो हमें कुछ पता ही नहीं है क्योंकि उनकी व्यवस्था ही ख़राब है".

वहीं दिल्ली स्थित स्वयंसेवी संस्था नाज़ फ़ाउंडेशन ट्रस्ट की अंजलि गोपालन का मानना है कि दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में वाकई एड्स की रोकथाम की दिशा में बहुत कम काम हुआ है.

अंजलि गोपालन ने बताया,"उत्तर भारत में ना तो ज़्यादा जाँच हुई है ना ही जागरूकता के लिए वैसे काम किया गया है, वहाँ साक्षरता भी कम है और स्वयंसेवी संस्थाएँ भी कम हैं वहाँ".

लैंसेट में प्रकाशित सर्वेक्षण में भारतीय दल की अगुआई करनेवाले चंडीगढ़ स्थित संस्थान पीजीआईएमईआर के डॉक्टर राजेश कुमार का कहना है कि सर्वेक्षण एक रास्ता दिखाता है.

राजेश कुमार ने कहा,"ये एचआईवी से ग्रसित लोगों में कमी आने की शुरूआत है और अगर उत्तर भारत में भी उसी तरह से ध्यान दिया गया जैसा कि दक्षिण भारत में हुआ तो वहाँ भी अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं".

भारत में काम करनेवाली स्वयंसेवी संस्थाओं को भी उम्मीद है कि इस सर्वेक्षण के आने के बाद उत्तर भारत में एड्स की रोकथाम के बारे में और गंभीरता से ध्यान दिया जा सकेगा.

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