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गुरुवार, 02 मार्च, 2006 को 12:21 GMT तक के समाचार
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'पाकिस्तान को अभी कुछ नहीं मिलेगा'

राष्ट्रपति बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
राष्ट्रपति बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच हुई चर्चा के बाद भारत पाकिस्तान में ऐतिहासित सहमति बनी है
भारत और अमरीका के बीच हुई परमाणु सहमति के बाद निश्चित तौर पर पाकिस्तान भी चाहेगा कि उससे भी अमरीका इसी तरह का समझौता करे और उसे भी वही सुविधाएँ मिले जो भारत को मिलेंगी.

पाकिस्तान इसकी माँग करता भी रहा है और उसका तर्क रहा है कि जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया था तभी पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किया था.

लेकिन क्या इसके लिए अमरीका तैयार है, तो मेरी राय में ऐसा नहीं है.

पाकिस्तान के साथ अमरीका कोई ऐसा समझौता इस समय नहीं करने जा रहा है क्योंकि भारत ने अपनी परमाणु जानकारी किसी को नहीं दी है जबकि पाकिस्तान के कुछ शरारती तत्वों ने जानकारियाँ दूसरे देशों को दी हैं.

और इस तथ्य से अमरीका ख़ौफ़ खाता है.

क़दीर ख़ान

जहाँ तक ये सवाल है कि क्या अमरीका को इस बात का पता नहीं था कि भारत और पाकिस्तान परमाणु परीक्षण करने जा रहे हैं तो मेरी राय है कि ऐसा नहीं है.

मुझे याद आता है कि 1996 में अमरीका ने कहा था कि उन्हें आशंका है कि भारत परमाणु परीक्षण करने जा रहा है और बाद में इसकी पुष्टि हुई कि भारत उस समय परीक्षण की तैयारी कर रहा था.

बाद में भारत ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया और पाकिस्तान ने अमरीका के मना करने के बावजूद परीक्षण किया.

तो इसका मतलब ये है कि अमरीका को पता भले न रहा हो उसे शक ज़रुर था.

जहाँ तक क़दीर ख़ान के परमाणु कार्यक्रम की जानकारी बेचे जाने का सवाल है तो वो बात अब पुरानी हो गई है.

राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने बार-बार कहा है कि पहले जो हुआ सो हुआ और अब पाकिस्तान ज़िम्मेदारी के साथ इस मसले पर काम कर रहे हैं.

यह मामला वैसे भी बहुत गंभीर नहीं था क्योंकि अगर क़दीर ख़ान ने जानकारी देना पाँच-सात साल और जारी रखा होता तो ये चिंता की बात होती.

मुझे लगता है कि अब पाकिस्तान सरकार ज़िम्मेदारी के साथ काम कर रही है.

भारत की भूमिका

अमरीका और यूरोप भारत को एक उभरती हुई ताक़त के रुप में देख रहे हैं.

लेकिन जहाँ तक पड़ोसी देशों का सवाल हैं तो वे दुर्भाग्यजनक रुप से भारत से डरे हुए नज़र आते हैं.

यदि भारत ने कूटनयिक स्तर पर और राजनीतिक स्तर पर अपने पड़ोसियों से संबंध ठीक नहीं किए तो यह अच्छा नहीं होगा.

भारत को निश्चित तौर पर ज़्यादा ज़िम्मेदारी से काम करना होगा वरना उसके आसपास मुश्किलें दिखाई देती रहेंगी.

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