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मंगलवार, 24 जनवरी, 2006 को 09:05 GMT तक के समाचार
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'बिहार पर बूटा का निर्णय असंवैधानिक'
बूटासिंह
विधानसभा भंग करने की बूटा सिंह की अनुशंसा पर बड़ा राजनीतिक बवाल मचा था
बिहार विधानसभा भंग किए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने कहा है कि राज्यपाल बूटा सिंह ने असंवैधानिक निर्णय लेते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल को गुमराह किया.

पाँच न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने बहुमत से (3:2) दिए गए इस निर्णय में कहा है कि राज्यपाल का उद्येश्य एक दल (जनतादल यूनाइटेड) को सरकार बनाने का दावा करने से रोकना था.

सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर 2005 में ही बिहार विधानसभा को भंग करने के फ़ैसले को असंवैधानिक ठहराया था लेकिन दोबारा हो रहे चुनावों को रोकने से इंकार कर दिया था.

इस निर्णय के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरु हो गया है और अटकलें लगाई जा रही हैं कि राज्यपाल बूटासिंह को वापस बुलाया जा सकता है.

निर्णय

संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल, न्यायमूर्ति बीके अग्रवाल और न्यायमूर्ति अशोक भान ने बूटा सिंह की केंद्र को भेजी गई रिपोर्ट को असंवैधानिक बताया.

जबकि न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत ने इसके ख़िलाफ़ अपना मत दिया.

विधानसभा भंग करने के लिए बूटा सिंह ने जो रिपोर्ट भेजी थी उसे संविधान पीठ ने दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा है कि यह रिपोर्ट पूर्वाग्रह और परिकल्पनाओं पर आधारित थी.

संविधान पीठ के निर्णय में कहा गया है कि बूटासिंह ने विधानसभा भंग करने की अनुशंसा का निर्णय जल्दबाज़ी में लिया और केंद्र सरकार को भेजा.

हालांकि संविधान पीठ ने केंद्र सरकार को इस मामले में दोषी नहीं ठहराया है लेकिन कहा है कि इसे लेकर एक बड़ी संवैधानिक बहस की ज़रुरत है.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर दिशा निर्देश तय करने की आवश्यकता भी बताई.

धारा 356

संविधान की धारा 356, जिसके तहत राज्यपाल को ये अधिकार होता है कि वह विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश करे, की न्यायिक समीक्षा की बात भी सुप्रीम कोर्ट ने कही है.

संविधान पीठ ने कहा है कि हालांकि धारा 356 के तहत राज्यपाल को पूरे संवैधानिक अधिकार हैं और वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं लेकिन इससे न्यायालय का अधिकार ख़त्म नहीं हो जाता कि वह इस धारा के तहत लिए गए निर्णय की सुनवाई करे.

न्यायालय ने कहा है कि राज्यपाल की रिपोर्ट पर कार्रवाई से पहले तथ्यों की जाँच कर लेनी चाहिए थी.

मामला

बिहार विधानसभा को 23 मई 2005 को मध्यरात्रि भंग कर दी गई थी.

राज्यपाल की भूमिका और केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस निर्णय पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था.

जब राज्यपाल बूटासिंह ने अपनी रिपोर्ट भेजी तब जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार सरकार बनाने का दावा करने वाले थे. लेकिन राज्यपाल ने उन्हें मौक़ा देने से इंकार कर दिया.

राज्यपाल की रिपोर्ट पर फ़ैसला लेने के बाद प्रधानमंत्री ने कहा था कि विधायकों की ख़रीद फ़रोख़्त रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया.

बाद में इसे लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान पीठ को भेजने का निर्णय लिया था.

सात अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बिहार विधानसभा को भंग करना असंवैधानिक था लेकिन तब तक शुरु हो चुकी चुनाव प्रक्रिया को रोका नहीं गया.

संविधान पीठ ने अपना विस्तृत फ़ैसला मंगलवार को सुनाया है.

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