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फीकी पड़ रही है चमक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रवासी भारतीय सम्मेलन समापन की ओर बढ़ रहा है और लग रहा है कि वह अपनी चमक खोता जा रहा है. हालांकि इस बार भारत के आधुनिक चेहरा माने जाने वाले दक्षिण भारत के शहर हैदराबाद में इसका आयोजन हुआ लेकिन प्रवासी भारतीयों की संख्या सबसे कम लगभग 1200 रही. जबकि इसके पहले दिल्ली और मुंबई के आयोजनों में यह संख्या दो हज़ार तक थी. प्रवासी भारतीय व्यवस्थाओं को लेकर भी शिकायत कर रहे हैं. ब्रिटेन के सरे से आए गुरुदर्शन सरना हों या अमरीका के डॉक्टर विजय कोली सबको आयोजन से लेकर कुछ न कुछ शिकायत है. ये ऐसे लोग हैं कि जो अधिकतर प्रवासी भारतीय दिवसों में मौजूद रहे हैं. खाड़ी के लोगों का कहना है कि यह सालाना जलसा बन कर रह गया है और इससे कुछ ठोस नहीं निकलता है. दुबई की कारोबारी संगठन के सुरेश कुमार ने तो कहा कि सरकार को अगला प्रवासी दिवस दुबई में आयोजित करना चाहिए. इसके लिए उन्होंने सभी सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा. अमरीका बनाम खाड़ी अमरीकी का दबदबा दुनियाभर में तो है ही वहाँ रहनेवाले भले ही प्रवासी भारतीय हों, वो भी दबदबे वाले हो जाते हैं.
खाड़ी में रह रहे लोगों की यह शिकायत है कि भारत सरकार की ज़्यादातर नीतियाँ अमरीका और पश्चिमी देशों में रह रहे लोगों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं. उनका कहना है कि अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों में रह रहे लोगों की पहले से ही स्थिति अच्छी है और दोहरी नागरिकता का मजा वे ही लूट पाएँगे. मतदान के अधिकार का अभी प्रस्ताव ही है और पता नहीं कब इसे अमली जामा पहनाया जाएगा. केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने तो अपने भाषण का केंद्र खाड़ी के देशों में रह रहे लोगों की कठनाइयों और केंद्र सरकार को क्या और करना चाहिए, इस पर ही केंद्रित रखा था. | इससे जुड़ी ख़बरें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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