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बुधवार, 04 जनवरी, 2006 को 10:38 GMT तक के समाचार
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'माओवादियों से निपटने में सेना न लगाएँ'

जनरल जोगिंदर जसवंत सिंह
जनरल जोगिंदर जसवंत सिंह ने कहा है कि सेना की नज़र माओवादी गतिविधियों पर है
भारतीय सेना के प्रमुख जनरल जोगिंदर जसवंत सिंह ने कहा है कि माओवादियों से निपटने के लिए सेना की तैनाती नहीं की जानी चाहिए.

देश के पूर्वी, पश्चिमी और मध्यभाग में माओवादी समस्या से निपटने में सेना सरकार का सहयोग कर रही है.

सेना के प्रमुख सिंह का कहना है कि राज्यों की पुलिस को बेहतर तालमेल से इस समस्या से निपटना चाहिए.

बीबीसी हिंदी से हुई विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय माओवादी समस्याओं से जूझ रहे राज्यों की पुलिस के बीच तालमेल के लिए एक योजना बनाने में लगी हुई है.

लेकिन उनका कहना था कि सेना माओवादी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए है और इसकी पूरी जानकारी उसके पास है, ताकि आपातस्थिति में यदि सेना को बुलाया जाए तो उसकी तैयारी पूरी रहे.

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जहानाबाद में जेल पर माओवादियों के हमले के बाद वहाँ नेशनल सेक्युरिटी गार्ड्स को बुलाया गया था. इस हमले के बाद कई क़ैदियों को माओवादी अपने साथ छुड़ाकर ले गए थे.

पर्यावरण की रक्षा

सेना प्रमुख ने बताया कि पूर्वात्तर राज्यों में विद्रोहियों से निपटने के लिए विशेष 'इकॉलॉजिकल बटालियन' यानी पर्यावरण की रक्षा के लिए बटालियन का गठन किया जा रहा है.

अल्फ़ा विद्रोही
आत्मसमर्पण करने वाले विद्रोही कार्यकर्ताओं को दिया जाएगा नया कार्य

जनरल सिंह ने बताया कि पहले चरण में दो-दो हज़ार की दो बटालियनें पहले चरण में असम में बनाई जा रही हैं.

उन्होंने बताया कि आत्मसमर्पण करने वाले विद्रोहियों को इन बटालियनों में भर्ती किया जाएगा और इनका मुख्य कार्य पर्यावरण की रक्षा करना होगा.

उन्होंने बताया कि ये बटालियनें वृक्षारोपण और नदियों के तटबंधन आदि का काम भी करेंगी.

इससे पहले विद्रोही अलगाववादियों को बीएसएफ़ और सीआरपीएफ़ में भर्ती किया जा चुका है लेकिन ये पहली बार होगा जब उन्हें पर्यावरण की रक्षा के कार्य में लगाया जाएगा.

उल्लेखनीय है कि 1979 में जब यूनाइटेड लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ असम (अल्फ़ा) का गठन हुआ तब उन्होंने विकास समितियाँ गठित की थीं जो बाढ़ से रक्षा के लिए नदियों के तटबंधन का काम किया करती थीं.

लेकिन सैन्य कार्रवाइयों के चलते अल्फ़ा को भूमिगत हो जाना पड़ा और ये गतिविधियाँ बंद हो गईं.

अब भारतीय सेना इस कार्य को दूसरे रुप से आगे बढ़ा रही है.

हालांकि भारतीय सेना का अनुभव आत्मसमर्पण करने वाले विद्रोही अलगाववादियों के साथ कुछ अच्छा भी नहीं रहा है क्योंकि उनको अनुशासन में रखना एक कठिन काम रहा है.

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