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'सेना हटाने की बात में राजनीति ज़्यादा'
ग़ुलाम नबी आज़ाद
आज़ाद मानते हैं कि पाकिस्तान की ओर से 'आतंकवाद' का ख़तरा अभी दूर नहीं हुआ है
जम्मू कश्मीर के नए मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा है कि राज्य से सेना हटने की बात में राजनीति ज़्यादा है और हक़ीकत कम.

कांग्रेस के मुख्यमंत्री आज़ाद ने कहा कि सेना हटाने का प्रचार एक बात है और सेना सच में हटाना दूसरी बात है. इसका विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और भारत के नेता लिखकर दे दें कि सेना की ज़रुरत नहीं है तो वे भी भारत सरकार से सिफ़ारिश करेंगे कि सेना हटा दी जाए.

जम्मू-कश्मीर में काँग्रेस के नेतृत्व में बहुदलीय गठबंधन सरकार के दो महीने पूरे हो चुके हैं. इससे पहले गठबंधन का नेतृत्व पीडीपी कर रहा था.

इस दौरान सरकार को भूकंप राहत कार्य और क़ानून व्यवस्था के अतिरिक्त कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

राज्य के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने जम्मू में बीबीसी संवाददाता बीनू जोशी के साथ एक साक्षात्कार में सरकार के सामने चुनौतियों और उपलब्धियों पर बातचीत की.

सवाल- दो महीने पहले आपने मुख्यमंत्री का पदभार जब जम्मू-कश्मीर में संभाला उस वक़्त भूकंप कार्यों से राज्य जूझ रहा था और हिंसा कि जो गतिविधियाँ वो भी काफी बढ़ी हुई थी. इन दो महीनों में आप अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ क्या मानते हैं?

जवाब- दोनों चीजों में मेरे ख्याल में जीत हमारी हुई है, अच्छा काम हुआ है. भूकंप से जो नुक़सान हुआ था... बारामूला, कुपवाड़ा तथा पूंछ ज़िले में, वहाँ सबसे बड़ी चुनौती हमारे पास थी कि सर्दियों से पहले उनके रहने का कुछ बंदोबस्त हो जाए और मैं यह कह सकता हूँ कि इस वक़्त 95 फीसदी अस्थाई शेल्टर तैयार हैं, जो कि अपने आप में एक रिकार्ड है. दूसरी चुनौती थी हमारे सामने कि जब भी कोई नया मुख्यमंत्री बनता है तो आतंकवादियों की ये कोशिश रहती है कि उसको डराया, धमकाया जाए इसके लिए वो फिदायीन हमले करवाते हैं...गोलियाँ चलवाते हैं... मेरे ख्याल में एक हफ्ते के बाद ही हमने उस पर काबू किया और मैं कह सकता हूँ कि पहला हफ़्ता उनका था बाकी पौने दो महीने हमारे सरकार के थे.

सवाल- इन दिनों जो भारत और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से सेना हटाने की जो बात चल रही है इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?

जवाब- सेना हटाना प्रचार के लिए एक बात है, हक़ीकत दूसरी बात है. पाकिस्तान की तरफ से सैंकड़ो और हज़ारों आतंकवादी इस सीमा के ज़रिए पिछले 16 सालों से आ रहे हैं. कई उसमें मारे गए और कई वो (पाकिस्तान) वापिस भी ले जाते हैं. पिछले एक साल में उन्होंने 55-60 के करीब वापिस भी लिए हैं जिनकी सज़ा यहाँ पूरी हो गई थी.

 उनको सुरक्षा भी बहुत चाहिए और इसके बाद कहते हैं कि इन्हें हटा भी दो. तो इसमें राजनीति ज़्यादा है और हक़ीकत कम है

तो इसका मतलब है कि उनके आतंकवादी यहाँ आते थे तभी तो वो वापिस ले रहे हैं. उसके बाद यह कहना कि सेना को हटाया जाए... मुझे बड़ा अफसोस होता है कि पाकिस्तान तो कहता ही है परंतु बहुत सारे लोग हमारे मुल्क के और हमारी रियासत के भी कहते हैं.

ऐसे नेता जो सेना हटाने की बात करते हैं उनको तो सबसे पहले कहना चाहिए कि हम सुरक्षित हैं कि हमको कोई मारने वाला नहीं है हमें फौज की, पुलिस या आर्मी की कोई ज़रूरत नहीं है. इसलिए इन्हें हटा दो. लेकिन उनको सुरक्षा भी बहुत चाहिए और इसके बाद कहते हैं कि इन्हें हटा भी दो. तो इसमें राजनीति ज़्यादा है और हक़ीकत कम है.

पाकिस्तान ये गारंटी दे चाहे यहाँ हमारे जो नेता सेना को हटाने की बात करते हैं वो हमको आतंकवादियों की तरफ से लिखके दे दो कि हमारे जम्मू-कश्मीर का हर नागरिक सुरक्षित रहेगा. कोई किसी गरीब, निहत्थे, आम सड़क पर चलने वाले लोगों को कोई नहीं मारेगा. अगर ये पाकिस्तान और हमारे इस रियासत के नेता जो सेना हटाने की बात करते हैं, हमें लिख के दें और उसकी गारंटी दे दें तो मैं ख़ुद भारत सरकार से सेना हटाने की सिफ़ारिश करूँगा.

सवाल- तो अगर आप अपने निजी जीवन पर आए तो जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बनना, जहाँ पैदा हुए, बड़े हुए, जहाँ की गली-कूचों से गुजरे कैसे लग रहा है ये?

जवाब- यहाँ काम मुश्किल है... राष्ट्रीय स्तर पर काम करना और रियासत में काम करना थोड़ा भिन्न है. क्योंकि यहाँ एक ही स्तर... विकास के स्तर पर काम करना है. और रियासत में यहाँ सुरक्षा का माहौल ठीक नहीं है यहाँ आपको चरमपंथ से भी लड़ना है.

यहाँ आपको सतह पर, सतह से नीचे और सीमा पार, तीन किस्म की लड़ाइयाँ चरमपंथ से लड़नी हैं. उसके बाद भ्रष्टाचार से भी आपको लड़ना है और नेता तथा जनता इसमें शामिल हैं क्योंकि जनता काम करवाना चाहती है इसलिए रिश्वत देती है.

विकास के बारे में किसी ने यह बात नहीं की है कि यहाँ सड़क की ज़रूरत है, बिजली की ज़रूरत है, पानी की ज़रूरत है, अस्पताल की ज़रूरत है. मैं हकीकत के आधार पर काम करना चाहता हूँ. लोगों को अगर ज़रूरत है तो बुनियादी चीजों की.

सवाल- क्या बचपन से ही राजनीति में आने का शौक था या कुछ और बनना चाहते थे?

जवाब- घर में हमारे तो माहौल था राजनीति का और स्कूल में मैं मॉनीटर था और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी हिस्सा लेता था. लोग नकल करते थे और हम नकल के ख़िलाफ़ थे फिर कश्मीर विश्वविद्यालय में भी सांस्कृतिक गतिविधयों में हिस्सा लेते थे और चुनाव में अपने विभाग की तरफ से हमेशा जीत कर आता था. मैं गाँधी जी से बहुत प्रभावित रहा हूँ.

सवाल- बच्चे क्या राजनीति में आना चाहते हैं?

जवाब- नहीं, बच्चे तो बिल्कुल राजनीति के ख़िलाफ़ हैं. मेरे दो बच्चे हैं, एक लड़का है और एक लड़की. दोनों राजनीति के ख़िलाफ़ है क्योंकि जब से वो पैदा हुए हैं और आज तक मुझे बिल्कुल वक़्त नहीं मिला. क्योंकि शादी से पहले मैं संसद सदस्य बन गया था.

जब वो पैदा हुए तो तब मैं केंद्रीय सरकार में मंत्री था. तो इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मैं कितना व्यस्त होता था. तो इसिलए आज तक मुझे एक-आध दिन या छुट्टी बिताने का भी मौका नहीं मिला. तो यह भी एक वजह हो सकती है जिसके कारण उनको राजनीति से बिलकुल नफ़रत है.

सवाल- आजाद साहब आपकी धर्मपत्नी शमीमा देव बहुत प्रसिद्ध गायिका हैं आप भी कभी गुनगुनाते हैं?

जवाब- मुझे शमीमा जी के गाने बहुत पसंद हैं कुछ कश्मीरी में हैं और कुछ हिंदी में...एक गाना उनका मुझे बहुत पसंद है. शादी से पहले का है, ‘हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है, लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है.’

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