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'ईरान पर ग़लती न दोहराए सरकार' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में केंद्र सरकार को समर्थन दे रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सरकार को सावधान करते हुए कहा है कि ईरान मामले पर अमरीका का साथ देने की ग़लती दोहराई न जाए. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने कहा है कि स्वतंत्र विदेश नीति से भटकने पर सरकार के लिए अस्थिरता का ख़तरा पैदा हो सकता है. सीताराम येचुरी और भारतीय जनता पार्टी नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा बीबीसी हिंदी सेवा के कार्यक्रम, आपकी बात बीबीसी के साथ में श्रोताओं के प्रश्नों का जवाब दे रहे थे. यशवंत सिन्हा ने केंद्र सरकार की वर्तमान विदेश नीति की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार की अमरीकापरस्त नीतियों से देश को नुक़सान हुआ है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) संसद के भीतर और बाहर इसका विरोध करेगी. यह पूछे जाने पर कि अगर इस बार भी मनमोहन सिंह सरकार ईरान मसले पर अमरीका के पक्ष में मतदान करेगी तो यूपीए के घटक वामदलों का क्या रुख़ होगा, सीताराम येचुरी ने कहा कि इस बाबत यूपीए सरकार 24 नवंबर को फ़ैसला लेगी. उन्होंने बताया, "हमने सरकार से स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि सरकार को अपनी पिछली ग़लती नहीं दोहरानी चाहिए. इस वक़्त हम सरकार पर इस बारे में हरसंभव दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं और यह दबाव केवल वामदलों की ओर से ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की तरफ से भी है." भारी भूल येचुरी ने कहा कि भारत ने सुरक्षा परिषद में अपनी स्थायी सदस्यता के लिए अमरीका का साथ पाने की हसरत में उसके पक्ष में अपना मत दिया जो कि एक बड़ी भूल थी. अमरीकी रुख़ को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा, "यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीका ही वह देश था जिसने सुरक्षा परिषद में नए देशों को शामिल करने का सबसे ज़्यादा विरोध किया था." उन्होंने कहा कि देश में लोगों के बीच ऐसा संदेश जा रहा है कि वर्तमान सरकार अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम से भटक गई है. यशवंत सिन्हा भी सरकार के इस क़दम को बिल्कुल ग़लत ठहराते हैं.
उन्होंने कहा, "सरकार को अमरीका का साथ न देकर एक तटस्थ रुख़ अपनाना चाहिए था. जब चीन और रूस जैसे देशों ने इस बारे में अपने को तटस्थ रखा तो फिर भारत के आगे क्या विवशता थी कि वो अमरीका का साथ दे." यशवंत सिन्हा सवालों का जवाब देते हुए वोल्कर मामले पर भी सरकार को घेरने से नहीं चूके. उन्होंने कहा, "वोल्कर मामले पर भी सरकार ने जो क़दम उठाए हैं, वो बीच का रास्ता खोजने जैसा है क्योंकि वोल्कर रिपोर्ट पर शक नहीं किया जाना चाहिए." उन्होंने कहा कि वोल्कर की इस स्वतंत्र रिपोर्ट से अमरीका और सुरक्षा परिषद भी सहमत हैं और इसमें केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह का नाम भी है, ऐसे में इसकी जाँच के दौरान नटवर सिंह का विदेश मंत्री बने रहना उपयुक्त नहीं था. | इससे जुड़ी ख़बरें ईरान मुद्दे पर वामपंथी अभी भी नाराज़28 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस भारत-अमरीका संयुक्त अभ्यास का विरोध07 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस वामपंथी नटवर के समर्थन में आए 04 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस वामपंथी लौटेंगे यूपीए की बैठकों में13 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस वामदलों ने परमाणु समझौते की निंदा की21 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस विनिवेश को लेकर गतिरोध बरक़रार01 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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