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पिछड़ों को सामान्य श्रेणी में जगह नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फ़ैसले में कहा है कि आरक्षण के दायरे में आने वाले उम्मीदवार अगर सामान्य सूची के लिए आवेदन करेंगे तो योग्यता सूची में आने के बावजूद उन्हें योग्यता सूची में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए. न्यायमूर्ति सुनील अंबावानी ने यह फ़ैसला हरिराम यादव की एक याचिका पर विचार करने के बाद सुनाया. इस फ़ैसले का विरोध करते हुए जनतादल (यू) नेता शरद यादव ने इसे संविधान के ख़िलाफ़ बताया है. उन्होंने कहा, "यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है. इस फ़ैसले को चुनौती दी जाएगी. पिछड़ी या दलित जाति के जो लोग अपनी क़ाबलियत से योग्यता सूची में आते हैं, वो तो देश के लिए गर्व की बात है. यह फ़ैसला पूरी तरह से ग़ैरवाजिब है." इस फ़ैसले के बारे में बीबीसी ने उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त एडवोकेट जनरल एसएमए काज़मी से बात की तो उन्होंने बताया, "1994 के राज्यस्तरीय क़ानून में ऐसा कहा गया था कि अगर आरक्षित श्रेणी का पात्र कोई उम्मीदवार योग्यता सूची के लिए वैध पाया जाता है तो उसे योग्यता सूची में स्थान दिया जाएगा, ऐसे में इस मामले में कोई विवाद नहीं रह जाता है." असंगत फ़ैसला काज़मी ने कहा, "न्यायाधीश ने अपनी तरह से उसकी विवेचना की है और उन्हें ऐसा करने का हक़ है पर ऐसे में जबकि एक ही क़ानून की व्याख्या दो अलग-अलग न्यायाधीश अलग-अलग तरह से करें तो फ़ैसले पर बहस की ज़रूरत साफ़ हो जाती है." काज़मी ने कहा कि इस फ़ैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जा सकती है और देनी भी चाहिए. दिल्ली में संविधानविद और वरिष्ठ अधिवक्ता आरके धवन भी इस फ़ैसले से सहमत नहीं हैं. धवन बताते हैं, "यह फ़ैसला बराबरी के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है और जातिवादी प्रभाव लिए हुए है. इसके बाद तो आरक्षित श्रेणी का लाभ पाने वाला कोई भी प्रत्याशी कभी-भी अपने स्तर से उपर नहीं उठ सकेगा." |
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