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शुक्रवार, 09 सितंबर, 2005 को 05:44 GMT तक के समाचार
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मंडल ने हाथ आया अवसर छीन लिया

कालिकानंद झा
कालिकानंद झा परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भी नियुक्ति पत्र नहीं पा सके
मैं अपने पिता के बाद परिवार का पहला सदस्य था, जो सरकारी नौकरी में जाने की तैयारी कर रहा था.

पिता रिटायर कर चुके थे और मेरी पढ़ाई भी पूरी हो गई थी. परिवार की देखभाल के लिए सन 1990 और उसके बाद के कुछ और वर्षों तक सरकारी नौकरी सबसे बेहतर विकल्प था.

उसमें एक बार जाने के बाद अपने और अपने परिवार के भविष्य के लिए आपको आने वाले तीस वर्षों तक कुछ सोचना नहीं पड़ता था.

मैं कई तरह की नौकरियों की परीक्षी की तैयारी करता था जैसे, संघ लोक सेवा आयोग, बिहार लोक सेवा आयोग और दूसरी कई अन्य नौकरियाँ के लिए.

लेकिन जैसा होता हैं कि सरकारी नौकरियाँ मिलना कभी बहुत आसान काम नहीं था. मुझे इन परीक्षाओं में आरंभिक सफलता तो मिलती थी लेकिन किसी न किसी सतर पर जाकर मेरी छंटाई हो जाती थी.

बिहार लोक सेवा आयोग में जब मैं दूसरी बार इंटरव्यू देने पहुँचा तो मुझे लगा कि बोर्ड के सदस्य का नजरिया मेरे लिए ठीक नहीं था. एक सदस्य ने तो दूसरी बार मेरा मज़ाक उड़ाते हुए यहाँ तक कहा, ‘‘आप फिर आ गए.’’

सदमा

इन तैयारियों के बीच ही उदयपुर विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के लिए प्रवक्ता पद की बहाली की सूचना आई.

मैं एमए पास था और इस पद की तमाम अनिवार्य योग्यता के निर्धारित मापदंड को पूरा कर रहा था. मेरा इंटरव्यू काफी लंबा चला था.

मैंने लगभग सभी सवालों का जवाब ठीक-ठीक दिया था. मैं अपने विश्वविद्यालय का टॉपर जो था.

 मैं नियुक्ति पत्र के आने का इंतज़ार करने लगा, जिसे कभी नहीं आना था

काफी उम्मीद के साथ मैं बाहर आया. और इस परिणाम का इंतज़ार करने लगा. कुछ महीने बाद मुझे एक चिट्ठी मिली, जिसमें ये लिखा था कि मेरा चयन हो गया था.

मेरे और मेरे परिवार की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. और मैं नियुक्ति पत्र के आने का इंतज़ार करने लगा, जिसे कभी नहीं आना था.

बाद में मुझे पता चला कि मंडल आयोग के कारण मेरी जगह मुझसे नीचे आने वाले किसी अभ्यार्थी को नौकरी दे दी गई. तब मुझे गहरा सदमा लगा था.

मैं तो उन जातियों में आता नहीं था जिससे मुझे किसी तरह का आरक्षण मिलता.

यह एक तरह का सपना था जिसने मेरे जीवन को एक नया मोड़ दे दिया.

उसके बाद मैं लगभग तीन साल और सरकारी नौकरी की तलाश में भटकता रहा. जिसका परिणाम मै पहले से ही जानता था.

आज मैं ख़ुद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए किए जाने वाले प्रकाशन के छोटे से व्यवसाय से जुड़ा हुआ हूँ.

दुनियावी मायनों में देखें तो सफल हूँ लेकिन एक टीस अभी भी मन में बाक़ी है.

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