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नेपाल में एफ़एम रेडियो पर छापा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल के एक प्रमुख एफ़एम रेडियो के हवाले से बताया गया है कि शुक्रवार यानी 21 अक्तूबर को देर रात सरकार ने उनके कार्यालय पर छापा मारकर प्रसारण से संबंधित तमाम ज़रूरी उपकरण ज़ब्त कर लिए. कांतीपुर एफ़एम रेडियो ने नेपाल सरकार पर आरोप लगाते हुए उनके इस क़दम को प्रेस की स्वतंत्रता पर कुठाराघात बताया है. इसी महीने की शुरुआत में नेपाल सरकार की ओर से एक नया प्रेस क़ानून बनाए जाने के बाद इस तरह का यह पहला मामला है. कांतीपुर एफ़एम रेडियो के स्टेशन प्रबंधक प्रभात रिमाल ने बताया कि नेपाल के सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों ने यह छापा शुक्रवार को उस समय मारा जब कार्यालय का कामकाज उस दिन के लिए ख़त्म हो चुका था. उन्होंने बताया कि पहले तो अधिकारियों ने काम कर रहे लोगों को आदेश दिया कि वे तुरंत अपना प्रसारण रोक दें क्योंकि उनके प्रसारण में प्रसारण क़ानून का उल्लंघन किया गया है. इसपर अधिकारियों ने उनसे लिखित आदेश माँगा पर उन्हें लिखित आदेश दिखाने के बजाय वहाँ पुलिस बुला ली गई. इस छापे की ख़बर फ़ैलते ही वहाँ तमाम विपक्षी दलों के नेता, मानवाधिकार कार्यकर्ता और तमाम कर्मचारी इकट्ठा हो गए जिसके बाद अधिकारी और पुलिसकर्मी वहाँ से चले गए. बर्बरता रेडियो सेवा के अधिकारियों के मुताबिक सरकारी अधिकारी आधी रात को पुलिस की चार गाड़ियों में भरकर आए और जबरन इनकोडर, सेटेलाइट मोडेम और डिजिटल ऑडियो रिकार्डर जैसे तमाम उपकरण उठाकर ले गए. इन उपकरणों का बेधेवर में होने वाले पूर्वी क्षेत्रीय प्रसारण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था. स्टेशन मैनेजर प्रभात रिमाल ने बताया कि इस स्टेशन का इस्तेमाल पिछले पाँच वर्षों से सरकारी प्रावधानों के अनुरूप किया जा रहा था. हालाँकि इस घटना के बारे में अभी तक कोई सरकारी बयान जारी नहीं किया गया है. यह घटना नेपाल में पत्रकारों और मीडियाकर्मियों के उस प्रदर्शन के कुछ घंटों बाद हुई जिसमें प्रदर्शनकारियों ने नेपाल सरकार के नए प्रेस क़ानून की प्रतियाँ जलाते हुए इसे प्रेस की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ बताया था. उधर नेपाल सरकार के अधिकारियों का कहना है कि यह क़ानून मीडिया को अधिक गंभीर और ज़िम्मेदार बनाने के लिए लागू किया गया है, न कि उनको बाँधने के लिए. ग़ौरतलब है कि नए क़ानून के मुताबिक मीडिया संस्थानों पर नेपाल के राजा या राजपरिवार की आलोचना करने पर रोक लगा दी गई है. यह क़ानून राजा ज्ञानेंद्र द्वारा सत्ता अपने हाथों में लेने के आठ महीने बाद आया है. |
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