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शुक्रवार, 14 अक्तूबर, 2005 को 16:12 GMT तक के समाचार
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'ऐसे ही चलता है भारत में राहत का काम'

एक भूकंप पीड़ित
राहत कार्यक्रमों का प्रबंधन काफ़ी चिंताजनक है.
....आखिरकार भारत ने अपना राहत कार्यक्रम शुरू कर दिया है.

भारत प्रशासित कश्मीर के उत्तरी हिस्से में आठ अक्तूबर को आए भूकंप के बाद क़रीब एक हफ़्ते तक पीड़ित लोग ख़ुद ही अपनी रोटी, कपड़ा, मकान और उपचार जुटा रहे थे.

कुछ ग़ैरसरकारी संगठनों ने लोगों की मदद ज़रूर की है पर प्रशासन द्वारा उपेक्षा और मौसम के बदलते मिज़ाज को झेल रहे इन लोगों के सामने ऐसे में अपने लिए विकल्प कम ही थे.

क्या औरतें और क्या मर्द, या फिर बूढ़े और जवान, सभी जहाँ-तहाँ सड़कों पर पड़े है और बाँटी जा रही राहत सामग्री ले रहे हैं.

कुछ युवा ख़ासकर पुरुष जगह-जगह पर काले झंडे दिखा रहे हैं, रास्ता रोक रहे हैं और लोगों से पैसे माँग रहे हैं.

इन सबके चलते भूकंप से बुरी तरह प्रभावित गाँव, उड़ी के लिए पहाड़ों के होकर गुज़रता तंग रास्ता लगभग जाम हो गया है.

ऐसी है तस्वीर

तमाम सेवा समूह, मिशनरी, चिकित्सक, राजनीतिज्ञ, पावर ग्रिड इंजीनियर, बैंक कर्मी, क्लर्क, धार्मिक कार्यकर्ता, बेरोज़गार नौजवान और धूल में पटे तमाम वाहन ऊपर की ओर बढ़ते हुए देखे जा सकते हैं.

इन वाहनों में से कुछ पर स्टीकर लगे हैं- फ़ॉलो मी और किलर हंटर.

वाहनों में चावल, बिस्कुट, पुराने कपड़े, कंबल, प्लास्टिक की चादरें, घासलेट, पानी, दवाएँ और खाना बनाने का तेल लदा हुआ है.

जो राहत सामग्री बँट रही है उसका तरीक़ा काफ़ी अव्यवस्थित-सा है.

भारत में और राहत कार्यक्रमों की तरह यहाँ भी मदद पहुँचा रहे कार्यकर्ता लोगों पर कपड़े, खाद्य सामग्री और प्लास्टिक की चादरें फेंक रहे हैं पर इसमें बूढे, कमज़ोर और महिलाएँ पीछे रह जाती हैं, राहत लपकने में वे असफल रहते हैं.

एक भूकंप पीड़ित
सेना ने लोगों की मदद की है.

कुछ लोग इसे व्यवस्थित करने की कोशिश में हैं और इसके लिए वे स्थानीय प्रशासन से बात कर रहे हैं ताकि राहत सामग्री सही ढ़ंग से बँटे.

लोगों को कपड़े, बिस्कुट और चावल दिए जा रहे हैं पर सवाल यह है कि इस भीगे मौसम में कहाँ और कैसे पकाएँ अपना खाना.

लोग खुले आसमान के नीचे ठंड और बरसात झेलते हुए सो रहे हैं. इससे कुछ देर के लिए राहत मिलती है तो वे अपने बच्चों को सड़क से गुजर रहे वाहनवालों से भीख माँगने भेज देते हैं.

यही तो है आपदा राहत कार्यक्रम- शुद्ध भारतीय शैली में.

एक क्रूर मज़ाक

पिछले चार दिनों से सुल्तान दिकि गाँव में राहत के चावल, बिस्कुट, कपड़े और ब्रेड बाँट रहे एक युवक बशीर अहमद कहते हैं, "ऐसे ही चलता है भारत में राहत का काम".

इस गाँव में भूकंप में क़रीब 50 लोग मारे गए हैं. भारत में राहत कार्यक्रमों की सबसे बड़ी समस्या इनका कुप्रबंधन है.

लोगों को राहत सामग्री सही ढ़ंग से नहीं मिल पाती और कितनी ही राहत सामग्री तो बेकार ही चली जाती है.

उड़ी को जानेवाले पथरीले रास्ते पर एक जगह खुले में एक स्थानीय राजनीतिक दल का स्टॉल लगा है जिसमें लोगों को बाँटने के लिए कुछ पुराने और बदबूदार कपड़े रखे हुए हैं.

उस रात पानी बरसता है और फिर अगले दिन लोगों को भीगे हुए कपड़े दे दिए जाते हैं.

उड़ी के बुरी तरह प्रभावित गाँवों में से एक कमलकोट में तो राहत सामग्री ले जा रहे वाहनों का रास्ता जाम है और लोग ठंड में खुले आसमान के नीचे ही सो रहे हैं.

लोगों के पास अपना सिर छिपाने के लिए टेंट तक उपलब्ध नहीं हैं. कुछ हैं तो सेना के जो कि पहले ही दिन वहाँ डाल दिए गए थे.

रास्ता जाम होने के कारण उन लोगों को घंटों इंतज़ार करना पड़ेगा, जिन्हें तुरंत इलाज के लिए नीचे ले जाना ज़रूरी है.

उजड़ा आशियाना

ग़ुलाम रसूल जैसे लोगों के लिए तो यह एक क्रूर मज़ाक ही है जो सड़क के किनारे अपनी पत्नी और तीन बेटियों के साथ राहत सामग्री ले जा रहे ट्रकों को आता-जाता देख रहे हैं.

यह 47 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर नियंत्रण रेखा से 12 किलोमीटर की दूरी पर सलामबाद नाम के गाँव में रहता है. रसूल पिछले तीन वर्षों में दूसरी बार बेघर हो गया है.

इससे पहले 2002 में पाकिस्तान से हो रही गोलाबारी में उनका घर, तमाम सामान और बेटी के दहेज के लिए रखे 20 हज़ार रूपए जलकर राख हो गए थे.

एक भूकंप पीड़ित
लोगों को पर्याप्त संख्या में टेंट भी उपलब्ध नहीं हो सके हैं.

वे बताते हैं, "मैं अपने दामाद को दहेज का बाक़ी हिस्सा क़िश्तों में देता रहता था ताकि वो मेरी बेटी के साथ बदसुलूकी न करे."

इसके बाद रसूल ने स्थानीय बैंक से दो लाख रुपए का कर्ज़ लेकर दो मंज़िला मकान बनवाया.

पिछले शनिवार को आए भूकंप में उनका वो मकान भी तबाह हो गया है और वो अपने परिवार सहित सड़क पर आ गए हैं.

राहत के नाम पर अभी तक इस परिवार के हर सदस्य को केवल 11-11 किलोग्राम चावल दिए गए हैं पर वो इनको कैसे और किन बरतनों में पकाएँ, इसकी परवाह किसी ने नहीं की है.

हर दूसरे दिन राहतकर्मी आते हैं और उन्हें कुछ सब्जियाँ, दूध और रोटी दे जाते हैं.

वे कहते हैं, "इन लोगों का भला हो और भला हो सेना के लोगों का वरना हम तो भूख और ठंड से मर जाते. अगर सरकार मदद नहीं करेगी तो मैं तो अपना तीसरा मकान बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकता".

अभी तक सरकार की तरफ से किसी ने भी उससे भूकंप के चलते हुए नुक़सान के बारे में नहीं पूछा है.

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