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शुक्रवार, 30 सितंबर, 2005 को 22:28 GMT तक के समाचार
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सभी को मिल जाते हैं 'गनर'

उत्तरांचल में गनर रखना आम हो गया है
उत्तरांचल में गनर रखना आम हो गया है
देहरादून ज़िला कांग्रेस के एक नेता हैं अनिल नेगी. ये न तो कोई मंत्री हैं, न विधायक, न ही इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक इनकी जान को कोई ख़तरा है लेकिन इनकी सुरक्षा में तीन-तीन गनर 24 घंटे तैनात रहते हैं.

हालाँकि सीमित साधनो वाले, इस छोटे से नए राज्य में अनिल नेगी अकेले नहीं हैं जिन्हें सारे नियम ताक पर रखकर गनर दिए गए हैं बल्कि क़रीब डेढ़ सौ लोगों को मुफ़्त में इस सरकारी सुविधा से नवाज़ा गया है.

इनमें सत्ताधारी कांग्रेस के नेताओं के अलावा, दूसरी पार्टियों के नेता, प्रवक्ता, प्रकोष्ठ के नेता, उनके पीए, कथित समाजसेवी, व्यापार-उद्योग के मामूली हैसियत के लोग, पत्रकार, आपराधिक छवि के कुछ लोग और यहाँ तक कि मुज़फ्फ़रनगर और नोएडा में रहने वाले लोग भी शामिल हैं.

उत्तरांचल में विपक्ष के नेता भगत सिंह कोश्यारी कहते हैं, "राज्य बनने के बाद पिछले चार सालों में रेवड़ियों की तरह जैसे गनर बाँटे गए हैं उससे तो ऐसा लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब गली-मुहल्ले के नेता भी यहाँ गनर लेकर घूमेंगे. सरकारी संपत्ति का ऐसा दुरुपयोग शायद ही कहीं और देखने को मिलेगा.”

एक अनुमान के मुताबिक तनख्वाह के अलावा एक गनर पर पंद्रह सौ रूपए प्रति माह ख़र्च आता है और टीए, डीए अलग.

इस हिसाब से इनपर लगभग पाँच लाख रुपए हर माह अतिरिक्त ख़र्च हो रहे हैं.

कहने के लिए तो ख़ुद शासन ने गनर उपलब्ध कराने के लिए तमाम मानक बना रखे हैं.

प्रक्रिया

इसके तहत ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के स्तर पर कमेटियाँ तय करती हैं किसे गनर दिया जाए और किसे नहीं, किसे एक दिया जाए और किसे दो.

गनर देने के पहले स्थानीय ख़ुफ़िया इकाई एलआईयू से इस बात की जाँच भी कराना अनिवार्य है कि वो किस स्तर और हैसियत का आदमी है, क्या उसे वास्तव में गनर की ज़रूरत है भी कि नहीं, उसका कोई आपराधिक रेकॉर्ड तो नहीं है, उसे गनर मुफ्त दिया जाए या फीस लेकर.

सुरक्षा कार
अक्सर लोगों को लाल बत्ती वाली सुरक्षा मिल जाती है

लेकिन ख़ुफ़िया विभाग के एक अधिकारी नाम गुप्त रखने की शर्त्त पर कहते हैं, "हैरत की बात ये है कि उत्तरांचल सरकार ने अब तक जितने भी गनर इस तरह से स्वीकृत किए हैं उनमें से किसी एक के लिए भी एलआईयू से रिपोर्ट नहीं मांगी गई और न ही इसकी ज़रूरत समझी गई.”

इसकी सफ़ाई में राज्य के प्रधान सचिव एम रामचंद्रन का कहना है, "हमारे पास मंत्रालयों से जिनकी भी संस्तुति आती है हम उन्हें ही ये सुविधा देते हैं.”

दूसरी ओर जिस दरियादिली से सरकार लोगों को गनर बाँट रही है वो राज्य पुलिस बल पर भी भारी पड़ रहा है.

राजधानी देहरादून में कुल 461 सिपाहियों में से क़रीब 140 सिपाही गनर की ड्यूटी कर रहे हैं जिस वजह से क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सिपाहियों की कमी हो रही है.

गनर के रूप में तैनात एक सिपाही का कहना है, "गनर की ड्यूटी कोई नहीं करना चाहता, हमारे लिए तो ये बवाल की तरह है, जिनकी सुरक्षा के लिए हम तैनात हैं वो हमारे साथ नौकरों की तरह व्यवहार करते हैं.”

ग़ौरतलब है कि पुलिस विभाग ने कड़ा रुख़ अपनाते हुए कुछ समय पहले 25 ऐसे लोगों को गनर वापस करने के लिए नोटिस भी जारी किए जिन्होंने सिर्फ रुतबा क़ायम करने के लिए गनर ले रखा था लेकिन इन्होंने अपनी पहुँच का इस्तेमाल कर फिर अपने लिए गनर की मंज़ूरी करा ली.

कुल मिलाकर उत्तरांचल में गनर या शैडो सुरक्षा कम स्टेटस सिंबल और रसूख़ का प्रतीक ज़्यादा हो गया है और सरकारी संपदा के इस अंधाधुंध दुरुपयोग के ख़िलाफ़ कोई मुखर विरोध भी नहीं हो रहा क्योंकि हर श्रेणी और वर्ग और हर पक्ष के लोग इसका लाभ उठा रहे हैं.

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