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बुधवार, 19 जनवरी, 2005 को 13:40 GMT तक के समाचार
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जिम कॉर्बेट का घर बिकाऊ

जिम कॉर्बेट
जिम कॉर्बेट नैनीताल से कीनिया चले गए थे
मशहूर शिकारी से जाने-माने वन्य जीव संरक्षक और नामी लेखक बने जिम कॉर्बेट का मकान बिकाऊ है.

इस मकान को जिम कॉर्बेट ने 1947 में भारत छोड़ने वक्त एक पड़ोसी को बेच दिया था.

लकड़ी का बना यह दोमंजिला भवन आज भी वैसे ही संरक्षित रखा गया है जिस हाल में जिम कॉर्बेट ने इसे बेचा था.

हालांकि उत्तरांचल सरकार ने इसे संग्रहालय में तब्दील करने की घोषणा की है लेकिन यह घोषणा फ़िलहाल कागज़ों पर दिखाई दे रही है.

वे भूले नहीं

मकान को ख़रीदने वाले पीके वर्मा ने कॉर्बेट के कीनिया जाने के बाद भी पत्र व्यवहार जारी रखा था.

नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों में जिम कॉर्बेट ने जीवन का अधिकांश हिस्सा बिताया, किताबें लिखीं.

वे कीनिया जाकर भी नैनीताल में बिताए गए दिनों को भुला नहीं पाए थे.

 हमने दीवारों का प्लास्टर बदलकर रंगाई-पुताई ज़रूर की है लेकिन इस मकान में कॉर्बेट की ट्राफियाँ, जानवरों के सजावटी समान वग़ैरह सब कुछ वैसा ही है जैसा कॉर्बेट छोड़ गए थे
रीता वर्मा

इस घर को गर्नी हाउस के नाम से आज भी जाना जाता है. इसमें कॉर्बेट की ट्राफियाँ, उनका सामान, फर्नीचर, पलंग और दूसरी चीजें आज भी हैं.

घर को खरीदने वाले पीके वर्मा की वारिस रीता वर्मा के अनुसार, "हमने दीवारों का प्लास्टर बदलकर रंगाई-पुताई ज़रूर की है लेकिन इस मकान में कॉर्बेट की ट्राफियाँ, जानवरों के सजावटी समान वग़ैरह सब कुछ वैसा ही है जैसा कॉर्बेट छोड़ गए थे."

रीता वर्मा के अनुसार उनके परिवार सभी सदस्य विदेशों में हैं. इस घर की देखरेख तक को यहाँ हममें से कोई नहीं आ पाता, इसलिए इस घर को बेचने के सिवा कोई विकल्प नहीं रह गया है.

लेकिन उनकी कोशिश इस मकान को ऐसे हाथों में सौंपने की है जो कि इसे जिम कॉर्बेट के साजो-सामान सहित सहेजकर रखे. यदि इसे उनकी याद में संग्रहालय के रूप में विकसित करने के लिए उपयोग में लाया जाए तो उन्हें खुशी होगी.

कॉर्बेट का घर
घर अंदर से बिल्कुल वैसा ही है जैसा कॉर्बेट छोड़ गए थे

उनका कहना है, "वैसे कई विदेशी कंपनियाँ इस मकान और इससे लगी ज़मीन का व्यापारिक इस्तेमाल करना चाहती हैं. लेकिन उत्तरांचल सरकार अगर इसे संग्रहालय बना दे तो यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात होगी."

इस भवन के बिकने पर इस दिशा में कुछ घोषणाएँ हुईं लेकिन अब तक संग्रहालय बनाने का काम आगे नहीं बढ़ पाया.

कॉर्बेट ने इस मकान में रहकर पाँच किताबें लिखी, 'मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊँ', 'मैन इटिंग लेपर्ड ऑफ रुद्रप्रयाग', 'जंगल लोन', 'ट्री टॉप्स', 'माई इंडिया'. ये किताबें काफी लोकप्रिय भी हुई थीं.

राज्य सरकार ने कॉर्बेट के योगदान और विदेशी सैलानियों के आकर्षण के मद्देनज़र इसे कॉर्बेट संग्रहालय बनाने की घोषणा कर तो डाली, लेकिन यह घोषणा अब तक फाइलों में ही धूल फाँक रही है.

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