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मच्छरों को मारने के लिए मछली | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के उत्तर प्रदेश में दिमाग़ी बुख़ार से निपटने के लिए अब स्वास्थ्य अधिकारियों ने मछली का सहारा लेने का फ़ैसला किया है. अधिकारियों ने कहा है कि दिमाग़ी बुख़ार मच्छरों से फैलता है इसलिए अब मच्छरों को मारने के लिए मछलियों का इस्तेमाल किया जाएगा. प्रयोग के तौर पर मच्छरों के मारने के लिए सबसे पहले मच्छरों का इस्तेमाल रायबरेली ज़िले से किया जाएगा. ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से और बिहार के कुछ ज़िलों में दिमाग़ी बुख़ार से पिछले दो महीनों के दौरान लगभग 800 लोगों की जानें जा चुकी हैं. अधिकारियों ने कहा है कि अब भी हालात में सुधार नज़र नहीं आ रहे हैं. मच्छरों को मारने के लिए मछली का इस्तेमाल करने के फ़ैसले के बाद राष्ट्रीय संक्रामक बीमारी संस्थान ने मछलियों की पहली खेप रायबरेली पहुँचाई है. रायबरेली के जीव वैज्ञानिक डॉक्टर डीके श्रीवास्तव ने कहा कि 100 मछलियों को अपनी नस्ल पैदा करने के लिए रखा जाएगा. उन्होंने कहा कि गुप्पी और गुम्बोसिया नाम की ये मछली नस्लें मलेरिया पर नियंत्रण पाने के कार्यक्रमों में कारगर साबित हुई हैं. यह क़रीब एक इंच लंबी मछली होती है और इसे ऐसे इलाक़ों में ले जाया जाएगा जहाँ मच्छरों को मारने के लिए धुआँ फैलाना संभव नहीं है. प्रशासन के पास मच्छरों को मारने के लिए धुआँ फैलानी मशीनें पर्याप्त संख्या में नहीं हैं. भारत की केंद्र सरकार ने दिमाग़ी बुख़ार का मुक़ाबला करने के लिए चीन और कोरिया से दवाइयाँ मंगाने का भी भरोसा दिलाया है लेकिन वे दवाइयाँ इस बीमारी का मौजूदा सीज़न निकलने के बाद ही इस्तेमाल की जा सकेंगी. केंद्र और राज्य सरकारें इस बीमारी से निपटने में कोताही के लिए एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं. डॉक्टरों का कहना है कि नवंबर आने तक यह बीमारी अपने आप ही कम हो जाएगी. |
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