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सरकार की उदासीनता से डॉक्टर भी दुखी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल इंस्टीयूट (एसजीपीजीआई) के चिकित्सा विशेषज्ञों के एक दल ने रविवार को गोरखपुर मेडिकल कालेज का दौरा किया. इन डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि अगर सरकारी मशीनरी इसी तरह उदासीन बनी रही तो अगले दो हफ़्तों में यह महामारी नियंत्रण से बाहर हो जाएगी. इस अस्पताल में आसपास के कई ज़िलों से इंसेफ़्लाइटिस के करीब 300 गंभीर मरीज़ भर्ती हैं. अभी तक इंसेफ़्लाइटिस के कारण 258 लोगों की मौत हो चुकी है. हर डेढ़-दो घंटे बाद एक मौत, लोग कुछ देर रोते है छाती पीटते हैं- बेबस परिवार वाले लाश लेकर चले जाते हैं. वार्ड में भर्ती बच्चों के माँ-बाप अपने जिगर के टुकड़े को छाती से लगाए, गोद में लिटाए कोई माथे पर बर्फ की पट्टी कर रहा है, कोई ग्लूकोज की बोतल पर निगाह लगाए है और कोई दौड़ के डॉक्टर के पास जा रहा है. व्यथा एक पिता इस तरह अपनी व्यथा सुना रहे हैं, "यह हमारा लड़का है. पहले बुख़ार हुआ उसके बाद किसी को पहचानता नहीं है कुछ और बोल देता है. इधर-उधर भागने लगता है." पिछले 24 घंटों में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में जापानी इंसेफ़्लाइटिस के 46 नए मरीज़ भर्ती हुए हैं और 26 की मौत हो चुकी है। पिछले 29 जुलाई से अभी तक 258 लोग जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की हैं, मौत के शिकार हो चुके हैं. इलाहाबाद, मेरठ, आगरा और दूसरे मेडिकल कॉलेज से आए डॉक्टर हर नये मरीज़ का हाल पूछकर नुस्खा लिखते हैं. एक डॉक्टर शिकायत करते हैं कि नेता और अफ़सर वार्ड का दौरा करते हैं तो उनके काम में बाधा आती है. लेकिन डॉक्टर मीडिया को अपना मददगार मान रहे हैं उनका कहना है कि मीडिया में हल्ला होने से सरकार ने ज़रूरी दवाएँ, आक्सीजन सिलिंडर और ग्लूकोज बोतलें बड़ी तादाद में मुहैया करा दी हैं. लेकिन बाल रोग विभाग के डॉ. एके राठी का कहना है कि पूरी कोशिश के बाद भी एक तिहाई मरीज़ों की मौत हो रही है. एहसास डॉ. राठी ने बताया, "‘रोज़ 15-17 की मौत हो रही है अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद हम बचा नहीं पा रहे हैं. सामने इतनी मौतें हो रहीं हैं तो दुःख तो होता ही है पर दूर बैठे लोगों को शायद इसका एहसास न हो." पूर्वांचल के कई ज़िलों, बिहार और सीमावर्ती नेपाल के लिए यही अस्पताल इंसेफ़्लाइटिस के मरीज़ों का केंद्र बन गया है, इसलिए हर कोई यहीं भागकर आ रहा हैं. कई सालों की लिखापढ़ी के बाद अब मेडिकल कॉलेज में जापानी इंसेफ़्लाइटिस की जाँच की किट आ गई है. पहले जाँच के नमूने लखनऊ, पूणे, और दिल्ली भेजे जाते थे. जाँच रिपोर्ट साल-छह महीने बाद मिलती थी. पिछले तीन-चार दिनों की जाँच-पड़ताल में 60 फ़ीसदी जाँच नमूनों में जापानी इंसेफ़्लाइटिस वायरस की पुष्टि हुई है. लक्षणों के आधार पर डॉक्टर बाक़ी मरीज़ों को भी जापानी इंसेफ़्लाइटिस वायरस का शिकार मान रहे हैं. जाँच लेकिन एसजीपीजीआई. न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टर प्रो. यूके मिश्रा का कहना है कि वे बाक़ी नमूने और गहराई से जाँच के लिए लखनऊ ले जाएँगे.
प्रो मिश्रा ने कहा कि यहाँ के डॉक्टरों ने उन्हें बताया है कि 60 फ़ीसदी नमूनों में जापानी इंसेफ़्लाइटिस वायरस की पुष्टि हुई है. उन्होंने बताया कि अब यह पता करना है कि बाक़ी नमूनों में कौन सा वायरस है. इसके लिए नमूनो को एसजीपीजीआई ले जाया जा रहा है, जहाँ गहराई से जाँच की बेहतर सुविधाएँ हैं. एसजीपीजीआई में माइक्रोबॉयोलाजी के प्रोफ़ेसर टीएन ढोल इस बार मरीज़ों की भारी भीड़ देखकर दंग हैं. उनका कहना है कि सरकार के मंत्रियों और नौकरशाही को वास्तविकता का एहसास ही नही हैं, इसलिए उनको यहाँ वार्ड में मौक़ा-मुआयना के लिए मजबूर करें. लेकिन गाँवो के जिन ग़रीब किसानों और मज़दूरों को यह नहीं पता कि इंसेफ़्लाइटिस मच्छर काटने से होती है और सुअर इसको बढ़ाते हैं वे क्या जाने कि मौलिक अधिकार और मानवाधिकार एक बुनियादी हक़ है. |
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