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'महामारी' का आँखों देखा हाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब मैं गोरखपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में घुस ही रहा था कि सीढ़ी पर एक नौजवान अपनी पाँच वर्ष की बच्ची की लाश लेकर उतर रहा था. अंदर पहुँचकर मैंने देखा कि एक-एक बिस्तर पर कम से कम दो बच्चे भर्ती थे, उनकी पसलियाँ दिख रही थीं और वे बुरी तरह से पस्त दिख रहे थे. एक वार्ड में मैंने देखा की क्षमता से दोगुने से भी अधिक मरीज़ थे, रात के दस बजे से लेकर दो बजे के बीच में सिर्फ़ एक अस्पताल में सात मौतें हो चुकी थीं. मेरी आँखों के सामने बिहार के गोपालगंज ज़िले से आई एक महिला ने दम तोड़ दिया, उसके बाद वहाँ लोग बहुत दुखी होकर रोने-चीख़ने लगे. मृत महिला के पति ने मुझे बताया कि वो किस तरह कितनी मुश्किल से अपनी पत्नी को गोपालगंज से गोरखपुर लाए थे. पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके गाँव में न तो कोई टीका लगाने आता है, और न ही मच्छर मारने वाली दवा छिड़कने आता है. जब मैंने उनसे पूछा कि क्या आपको पता है कि दिमाग़ी बुख़ार की बीमारी कैसे फैलती है तो उन्होंने कहा, "नहीं, हमें नहीं मालूम." अस्पताल के वार्ड में मैने कई लोगों से पूछा, लेकिन उनमें से ज़्यादातर लोगों को यह पता नहीं था कि यह बीमारी कैसे फैलती है. पहले राज्यपाल टी राजेश्वर राव आए, उसके बाद राज्य के मुख्य सचिव आए, उसके बाद नेताओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया. शनिवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान ख़ुर्शीद आए, उनके साथ उनके समर्थकों का हुजूम भी आया जो वार्डों में घुस आया और वहां नारे भी लगाए. इस तरह के दौरों से डॉक्टरों में बहुत नाराज़गी है क्योंकि उनका कहना है कि सीनियर डॉक्टर उन्हें हालत की जानकारी देने में फँस जाते हैं और इलाज में व्यवधान आता है. एक जूनियर डॉक्टर ने बताया कि इतने सारे मरीज़ हैं जिन्हें दवा और देखभाल की ज़रूरत है, फिर उनके साथ जो लोग आए हैं उन्हें भी खाने-पीने और रहने की जगह चाहिए, लेकिन किसी को इन सबसे कोई मतलब नहीं है. उन्होंने कहा, "यहाँ बड़े-बड़े लोग आते हैं, पत्रकार वार्ता करते हैं, कुछ भी बयान देकर चले जाते हैं लेकिन असली समस्या की चिंता किसी को नहीं है." गोरखपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में तैनात डॉक्टरों का कहना है कि स्थिति को नियंत्रण में नहीं कहा जा सकता क्योंकि मरीज़ों का अस्पताल आना जारी है. |
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