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गुरुवार, 25 अगस्त, 2005 को 14:31 GMT तक के समाचार
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टीका तैयार करने में मुश्किलें

टीएन ढोले
मच्छरों के काटने से होती है ये बीमारी
भारत के उत्तरप्रदेश राज्य में स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अड़ियल रवैए के कारण इंसेफ़्लाइटिस का बेहतर और सस्ता टीका तैयार नहीं हो पा रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार के पास इंसेफ़्लाइटिस पर नियंत्रण के लिए कोई दीर्घकालीन योजना नहीं है, जबकि पूर्वी उत्तरप्रदेश में इस बीमारी से हर साल सैकड़ों लोग या तो बीमार हो जाते हैं या अपंग.

जापानी इंसेफ़्लाइटिस बीमारी के लिए इस समय एकमात्र जेई वैक्सीन इस्तेमाल हो रही है जो भारत सरकार की इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की हिमाचल प्रदेश स्थित कसौली प्रयोगशाला में बनती है.

यह जेई वैक्सीन चूहों के दिमाग से कुछ पदार्थ निकालकर बनाई जाती है, जिसमें लंबा समय और अधिक ख़र्च आता है.

अभी इसी वैक्सीन का इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन न तो उत्तरप्रदेश सरकार इस वैक्सीन को बनवाने के लिए अग्रिम धन दे पाती है और न ही कसौली इंस्टीट्यूट के पास यह क्षमता है कि वह राज्य को हर साल डेढ़ करोड़ टीका उपलब्ध करा सके.

सलाह

पिछले साल कुल चार लाख टीके मिले थे, जो काफ़ी नहीं थे. संजय गाँधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट (पीजीआई), लखनऊ में विशेष माइक्रोबायोलॉजी विभाग की एक टीम ने तीन सालों तक गोरखपुर के गाँवों में काम किया था.

 दरअसल ये केंद्र सरकार के दफ़्तर हैं. आईसीएमआर और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमोदन नहीं दिया है. यह उनके स्तर पर है. वह अनुमति देंगे तो हम यहाँ टेस्ट वर्क करे, उसका रिजल्ट देखा जाए. हमारे यहाँ एक भी सूचना प्राप्त नहीं हुई है. पूछा जाएगा तो हम अनुमति देंगे
स्वास्थ्य महानिदेशक ओपी सिंह

उसके बाद इस टीम ने वर्ष 2002 में उत्तरप्रदेश सरकार के स्वास्थ्य विभाग को सलाह दी थी कि वह चीन या कोरिया में टिट्शू कल्चर से बनी वैक्सीन मंगवाएं, जिससे उत्तरप्रदेश में इस टीके का परीक्षण किया जा सके.

पीजीआई के डॉक्टरों का कहना है कि यह वैक्सीन सस्ती है और आसानी से बन जाती है. एसए 14142 नाम की इस वैक्सीन का इस्तेमाल करके चीन, कोरिया और नेपाल ने काफ़ी हद तक बीमारी पर काबू पाया है.

लेकिन स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च से इस टीके के आयात की अनुमित माँगी गई थी, लेकिन उन्होंने पत्र का जवाब देना भी उचित नहीं समझा.

पीजीआई में माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग के प्रो. टीएच ढोल का कहना है आईसीएमआर अपने स्वार्थवश यह अनुमति नहीं दे रहा है.

उन्होंने बताया, "यह बहुत बढ़िया वैक्सीन है. सभी फ़ील्ड ट्रायल में बताया गया है कि यह बेस्ट वैक्सीन है. जैसे ही देश में एक बेहतर वैक्सीन आएगी इस लोकल वैक्सीन का उत्पादन बंद हो जाएगा. यह सरकार से से पूछिए कि क्यों नहीं वैक्सीन आयात कर रही है."

लेकिन इस बाबत जब दिल्ली में आईसीएमआर के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई तो कोई वैज्ञानिक उपलब्ध नहीं हुआ.

सहमति

उत्तरप्रदेश के स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ ओपी सिंह ने बीबीसी को बताया कि इस संबंध में उनको अधिक जानकारी नहीं है, लेकिन वैक्सीन के फील्ड ट्रायल की बात से वह सिद्धांत रूप में सहमत हैं.

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प्रो. ढोले ने आईसीएमआर पर दोष मढ़ा

उन्होंने बताया, "दरअसल ये केंद्र सरकार के दफ़्तर हैं. आईसीएमआर और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमोदन नहीं दिया है. यह उनके स्तर पर है. वह अनुमति देंगे तो हम यहाँ टेस्ट वर्क करे, उसका रिजल्ट देखा जाए. हमारे यहाँ एक भी सूचना प्राप्त नहीं हुई है. पूछा जाएगा तो हम अनुमति देंगे.”

डॉ ओपी सिंह का कहना है कि इस मामले में निर्णय केंद्र सरकार को लेना है और मुख्य सचिव के स्तर पर बात की जा रही है.

इस बीच ख़बर है कि आंध्र प्रदेश सरकार वियतनाम व अन्य देशों से वैक्सीन मंगाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक एजेंसी की मदद से बड़े पैमाने पर टीकाकरण कर रही है.

ख़बर है कि राज्यपाल राजेश्वर राव ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर बड़े पैमाने पर टीकाकरण की सलाह दी है, लेकिन अभी राज्य सरकार अपनी पुरानी गति से चलती दिख रही है.

संवाददाताओं ने जब मुख्यमंत्री से सवाल भी पूछे तो यह कहकर टाल गए कि जरूरी दवाओं का इंतजाम किया जा रहा है.

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