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मस्तिष्क ज्वर से 167 लोगों की मौत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश में नेपाल की सीमा से लगे ग्रामीण इलाक़ो में मस्तिष्क ज्वर से कम से कम 167 लोगों की मौत हो गई है. मस्तिष्क ज्वर के नाम से जानी जाने वाली जापानी एनसेफ़्लाइटिस नामक बीमारी मच्छरों के काटने से होती है. राजधानी लखनऊ में प्राप्त सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक 149 लोगों की मौत अकेले गोरखपुर के एक अस्पताल में दर्ज की गई है. दो अन्य लोगों के मरने की ख़बर बहराइच से आई है. अधिकारियों के अनुसार गोरखपुर और बहराइच के अस्पतालों में अभी भी मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित 250 लोग भर्ती हैं. इस साल मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित 560 लोगों को राज्य के अस्पतालों में लाया जा चुका है. इससे निपटने के लिए हर साल डेढ़ करोड़ दवाइयों की ज़रूरत है लेकिन उत्तर प्रदेश को सिर्फ़ दो लाख दवाईयां ही मिली हैं. गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर केपी कुशवाहा ने बताया कि अस्पताल में रोज़ 40 से 50 मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित रोगी आ रहे हैं. उन्होंने बताया कि अस्पताल में और रोगियों के लिए न तो जगह है और न ही पर्याप्त संसाधन. ग़रीब बच्चे चपेट में मस्तिष्क ज्वर का प्रकोप मुख्य तौर पर ग्रामीण इलाक़ों में देखने को मिल रहा है और छह महीने से 15 साल उम्र के बच्चों पर इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ा है. लखनऊ के संजय गाँधी पोस्टग्रेजुएट मेडिकल इंस्टीट्यूट में माइक्रोबायलॉजी के प्रोफ़ेसर डॉ. टीएन ढोले ने गोरखपुर में मस्तिष्क ज्वर प्रभावित इलाक़ो में तीन साल तक काम किया है. उन्होंने भी इस बात पुष्टि की बीमारी की चपेट में ज़्यादातर कम आय के ग्रामीण लोग आते हैं. डॉ. ढोले ने कहा कि मस्तिष्क ज्वर की चपेट में आकर हज़ारों लोग विकलांग हो चुके हैं. दक्षिण एशिया में कई देश सफलतापूर्वक इस बीमारी पर काबू पा चुके हैं. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय प्रशासन इसे रोकने में नाकाम रहा है. |
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