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हज़ारों को विकलांग बनाता है मस्तिष्क ज्वर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर कोई बच्चा पिछले दस साल से पेट में आपरेशन के जरिए डाली गई नली से खाना खा रहा हो. कोई ऐसा बच्चा हो जो सालों से बेवजह हंसता ही रहे या रोता ही रहे. किसी की आवाज़ ही गायब हो गई हो या फिर कोई ऐसी किशोरी जो किसी को देखते ही हमला करने लगे तो ऐसी जिंदगी को क्या कहेंगे. ऐसी ज़िंदगी इन बदनसीब मासूमों को उस जापानी इंसेफ़्लाइटिस वायरस ने दी है जो हर साल जुलाई से लेकर दिसंबर तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में मौत का क़हर बन कर आता है. यह न केवल सैकड़ों बच्चों की जान ले लेता है बल्कि हज़ारों को स्थाई रूप से विकलांग बना देता है. गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के लंबे गलियारों को पार करते हुए रह-रह कर सुनाई देने वाला रुदन आपको अंदर से हिला सकता है. बाल रोग विभाग के प्रोफेसर के.पी. कुशवाहा कहते हैं, ‘‘यहां आने वाले बच्चों में से तीस फीसदी के लिए आगे की ज़िंदगी का मतलब सिर्फ सांसे लेना भर ही होता है.’’ पर ज्यादा अफ़सोस की बात है कि मासूमों की मौत और विकलांगता का यह सिलसिला पिछले 28 वर्षों से जारी है. 1978 से पिछले साल तक अकेले मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुए 10418 बच्चों में 2878 की मौत हो गई थी और 2045 स्थाई विकलांगता के शिकार हो गए थे. जापानी इंसेफ़्लाइटिस रोग का हमला सबसे पहले जापान में सन 1871 में हुआ पर इसके विषाणुओं की पहचान 1925 में ही हो पाई और 1935 में इस विषाणु का नाम जापानी इंसेफ़्लाइटिस वायरस पड़ा. भारत में इसे मस्तिष्क ज्वर के रूप में जाना जाता है. भारत में 1952 में नागपुर और चिंगिलपुर में कुछ रोगियों के रक्त परीक्षण में इस वायरस की मौजूदगी का पता चला. पांव जमाए पर जहां दुनिया और देश के बाकी हिस्सों में इस घातक विषाणु के फैलाव पर काबू पा लिया वहीं गोरखपुर में इसने स्थाई रूप से अपने पांव जमा लिए. प्रो. कुशवाहा कहते हैं, ‘सामाजिक आर्थिक रूप से अत्यन्त पिछड़े इस क्षेत्र में इस रोग को माकूल माहौल मिला. जहां खाने के लाले हो और पौष्टिक आहार एक सपना हो, वहाँ ऐसे रोग बिन बुलाये मेहमान की तरह जब तक चाहते हैं, आ जाते हैं.’
पर इस बड़ी वजह के अलावा इस रोग के यहां डेरा जमा लेने की और भी कई वजह हैं. इनमें सबसे बड़ी वजह इस समस्या के प्रति राजनीतिक संवेदनहीनता है. पिछले 28 वर्षों में हर साल बरसात से लेकर सर्दियां शुरू होने के बीच होने वाली सैकड़ों मौतों के बावजूद आज भी इस रोग पर नियंत्रण सरकार की कार्यसूची में कभी शामिल नहीं हो सका. मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक बताते हैं कि सरकारों ने हमेशा से इसे महामारी मानने की बजाए इस प्रकार की सूचनाओं पर अंकुश लगाने की कोशिश की ताकि उन पर समस्या से आंखें मूदें रखने का आरोप न लग सके. उदासीनता सरकार की संवेदनहीनता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस बार जुलाई के पहले सप्ताह से ही मरीजों के आने का सिलसिला शुरू हो जाने के बावजूद सरकार ने प्रादेशिक स्वास्थ्य सेवा के 90 फीसदी कर्मचारियों और वाहनों को पंचायत चुनाव प्रक्रिया में तैनात कर दिया. संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट आयुर्विज्ञान संस्थान में माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डा. टीएन ढोल इसे मानवाधिकार से जुड़ा सवाल मानते हुए कहते हैं,'' सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष, ड्रग कंटोलर सबको यहां बुलाना चाहिए ताकि वे स्थिति की भयावहता का अंदाज़ लगा सकें.''
मौतों के लगातार बढ़ रहे आंकड़ों से थोड़ा अलग सबसे ज्यादा भयावह तस्वीर उन बच्चों की है जो इससे बच तो गए पर भारी कीमत चुका रहे हैं. गोरखपुर के दक्षिणी हिस्से की बांसगांव तहसील के गगहा क्षेत्र का अभय 1982 में इस कहर की चपेट में आया था. वह मौत के हमले से तो बच गया पर पिछले 16 साल से पेट में पड़ी नली के सहारे अपना आहार ले रहा है. अभय के अध्यापक पिता राघवेन्द्र शाही कहते हैं कि उसे लगातार डाक्टर की निगरानी में रखना पड़ता है. गोरखपुर में बच्चों के एक डॉक्टर बीबी गुप्ता बताते हैं कि इंसेफ़्लाइटिस के कारण बच्चों में ग्यारह प्रकार की विकलांगता देखी गई है. इसमें सबसे ज्यादा लकवा और बुद्धिमंदता के शिकार होते हैं. डा. गुप्ता के मुताबिक ‘रोग के विकार बच्चों में इनमें से एक या एक साथ कई विकृतियां आ सकती हैं।’ भारत के भविष्य के इन कर्णधारों की मौत और विकलांगता के इस खतरे से निपटने का एक ही प्रभावी तरीका है कि इस रोग के संभावित हमले से पूर्व ही वृहद स्तर पर टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जाए. |
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