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हम हारे हुए सिपाही से हैं:हरेराम सिंह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आरक्षण विरोधी आंदोलन का मुख्य केंद्र दिल्ली रहा. इस आंदोलन के सबसे बड़े नेता हरे राम सिंह थे. बिहार के नवादा ज़िले के गाँव धेवधा से हरेराम सिंह 1984 में दिल्ली आए और 1985 से लेकर 1987 तक रामजस कॉलेज के अध्यक्ष रहे. 1991 के दौरान व्यापक स्तर पर आरक्षण विरोधी आंदोलन का जिम्मा उठाने वाले हरे राम सिंह आज तीस हज़ारी अदालत में अधिवक्ता हैं. वे आज अपने आपको एक हारे हुए सिपाही की तरह देखते हैं और राजनीतिक दलों के रवैये से बेहद नाराज़ नज़र आते हैं. मोहन लाल शर्मा ने हरेराम सिंह से पूछा कि वे 15 साल पहले आरक्षण विरोधी आंदोलन में क्यों कूद पड़े थे? जवाब- मंडल आयोग की सिफ़ारिशें जब लागू की गईं और उसमें साफ़ ज़ाहिर था कि इसे राजनीति के तहत लागू किया गया है तो छात्रों में एक बड़ा असंतोष हुआ. छात्रों ने बड़ी उम्मीद के साथ विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाने में सहयोग किया था. छात्र समुदाय को ऐसा लगा कि उनके साथ दगा किया गया है, विश्वासघात हुआ है और इसके ख़िलाफ़ छात्र सड़क पर आ गए. मैं पहले से ही छात्र नेता था. इसलिए छात्रों ने मुझे एक नेता के रूप में देखा और निर्णायक फ़ैसले मेरे ऊपर छोड़ दिए सभी कॉलेजों के अध्यक्ष और छात्र नेता हमारे साथ थे. हमने पहले दिन से छात्र आंदोलन शुरू किया और सफलता के साथ इसे आगे बढ़ाया. सवाल- लेकिन आपके साथ आंदोलन में शामिल अधिकतर सहयोगी अगड़ी जातियों के ही थे? जवाब- मैंने अपना समय, ऊर्जा और खून इस आंदोलन को दिया है. इस आंदोलन में जाति का कोई स्थान नहीं था. हमारे साथ कुछ ऐसे नेता भी थे जो पिछड़ी जाति के भी थे. राजीव गोस्वामी जिन्होंने पहला आत्मदाह किया वह आरक्षण के दायरे में आते थे. पुलिस ने एक लड़के की पीट-पीटकर जान ले ली थी, वह 14 साल का था, उसका नाम फ़ारूख था और वह मुस्लिम था. सवाल- आज़ादी के बाद इतिहास में इससे बड़ा कोई छात्र आंदोलन नहीं हुआ? जवाब- अमरीका की जो क्राँति हुई या हम ब्रिटेन या स्वीडन में छात्र आंदोलन की बात करें, चीन का छात्र आंदोलन बेहत उग्र था, भारत में यूं तो छोटे-बड़े कई आंदोलन हुए लेकिन भारतीय इतिहास में आरक्षण विरोधी आंदोलन से बड़ा कोई और छात्र आंदोलन नहीं हुआ. एक राष्ट्रीय नेता के रूप में मैंने आंदोनल का नेतृत्व किया और हमारा मक़सद था जाति विहीन समाज. इस जाति के ख़िलाफ़ हमने आंदोलन शुरू किया. हर वर्ग के लोग इसमें शामिल थे. दो अक्टूबर 1991 को वोट क्लब में जो रैली हुई उसमें 8 लाख छात्र आए हुए थे. सवाल- उसी दौरान एक सिलसिला शुरू हुआ छात्रों द्वारा आत्मदाह का, क्या यह भी रणनीति का हिस्सा था? जवाब- ढाई साल आंदोलन चलने के बाद जब एक ऐसी निर्णायक स्थिति में आंदोलन आ गया, जब छात्रों को लगा कि सरकार ध्यान नहीं दे रही है. तब आत्मदाह का सिलसिला शुरू हुआ. यह आंदोलन का अंतिम चरण था. छात्र कुंठा के चलते आत्मदाह कर रहे थे जो कि मानवता के सिद्धांत के ख़िलाफ़ था. जब हमने यह देखा कि छात्रों में आत्मदाह की प्रवृत्ति बढ़ रही है हमने आंदोलन वापस ले लिया.
सवाल- आरक्षण विरोधी आंदोलन जब शुरू हुआ तब उस समय निश्चित तौर पर राजनीतिक समर्थन मिला होगा. किन से आपको समर्थन मिला? जवाब- ये उस आंदोलन के साथ अन्याय होगा यदि मैं कहूं कि उसे कोई राजनीतिक समर्थन नहीं था. दोहरी नीति के दोगले राजनेताओं के साथ-साथ सत्तापक्ष और विपक्ष के लोगों ने भी साथ दिया. उसमें भारतीय जनता पार्टी की भी भागीदारी थी, कांग्रेस भी शामिल थी. साथ ही हमें जब किसी चीज़ की मदद की ज़रूरत होती थी सब मदद करते थे. बड़े नेताओँ में मैं राजीव गाँधी से मिलता था. वो विपक्ष के नेता थे, उन्हें मालूम था कि जाति और आरक्षण देश के लिए हानिकारक है. सवाल- आरक्षण आंदोलन जब दूसरे चरण में पहुंचा तो इसे कुचल दिया गया. क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति थी या इसमें फिर समर्थन नहीं मिला? जवाब-ये राजनीतिक इच्छा की बात नहीं है. हम जानते थे कि दूसरे चरण का आंदोलन विकराल रूप धारण नहीं करेगा. इसे चलने ही नहीं दिया जाएगा. सरकार इसे कुचलना चाहती थी. एक बहुत विशाल आंदोलन को एक बहुत ही बेरहमी के साथ कुचल दिया गया. छात्र नेताओं को जेल भेज दिया गया. साधारण छात्रों तक को नहीं छोड़ा गया. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी सरकार आंदोलन को बढ़ते हुए भी देखना चाहती थी ताकि वो पिछड़ी जातियों के लोगों को बता सके कि जो मंडल आयोग हमने तुम्हें उपहार के रूप में दिया है वह किस क़ीमत पर दिया है. सवाल- आज इस आंदोलन को ख़त्म हुए 15 साल हो गए. कितना बदलाव आया? जवाब- जिस समय आरक्षण पर बात चल रही थी उस समय काका साहब कालेलकर ने भी इसका विरोध किया था. लोग अपने तात्कालिक फायदों की बात करते हैं. आरक्षण की राजनीति आज चल रही है. लोगों को आज भी समझ में नहीं आ रहा कि इससे देश बंट रहा है, जाति के नाम पर समाज में दंगे हो रहे हैं. उड़ीसा, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश इसका शिकार हैं, इसका शिकार हरियाणा है, पंजाब है, महाराष्ट्र है. आरक्षण ने समाज को बाँटा है. ये कभी सकारात्मक हो भी नहीं सकता. सवाल- आप आरक्षण विरोधी आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे. हर आंदोलन से कुछ ऐसे नेता पैदा होते हैं जो अपना राजनीतिक में आगे बढ़ते हैं. लेकिन मंडल विरोधी आंदोलन का ऐसा कोई नेता नहीं निकला? जवाब -वे राजनीतिक लोग नहीं थे. सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेताओं में अंतर होता है. मैं छात्र राजनीति इसलिए कर रहा क्योंकि मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता था. हम समाज की मदद करना चाहते थे. हमें सत्ता का कभी लोभ नहीं रहा. ये राजनीतिक पार्टियाँ भी इतनी गंदी होती हैं कि इनको जब हरेराम सिंह को नेता बनाना था बना दिया. राष्ट्रीय स्तर पर हीरो बना दिया. पर जब नेताओं को लगा कि अब इस आंदोलन की जरूरत नहीं रही तो छोड़ दिया. मैं मूलतः एक किसान परिवार से हूँ और पढ़ने-लिखने वाला छात्र रहा. मैं लोगों को हमेशा ही बताता रहा कि ये देश को तोड़ देगा. मैं अपने आपको आज एक जंग में हारे हुए सिपाही के रूप में देखता हूँ. लेकिन हारने के बाद भी मैंने ज़िंदगी नहीं हारी. एक समय आएगा जब मैं सामाजिक क्राँति शुरू करूँगा और इसमें मैं लोगों को बताऊंगा कि कैसे आप अपनी जाति छोड़कर संपूर्ण समाज की बात करें. हालाँकि मुझसे कई लोग कहते हैं कि आप मंत्री होते, आप सरकार में होते. तो न मैं पहले बड़ा था और न मैं अब छोटा हो गया हूँ. |
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