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एक आंदोलनकारी छात्र की डायरी से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले बहुत ही कम ही छात्र शायद यह जानते होंगे कि नॉर्थ कैंपस में रामजस कॉलेज और लॉ फ़ैकल्टी के चौराहे का नाम 1991 में कभी क्राँति चौक हुआ करता था. पंद्रह साल पहले ये वह जगह हुआ करती थी, जो मंडल विरोधी आंदोलन का गढ़ बन चुकी थी. इसी जगह पर छात्र धरना, प्रदशर्न, सड़क रोकना और पूतले फूंकने जैसे तमाम काम किया करते थे. छात्र मान रहे थे कि वे कोई क्रांति कर रहे हैं और इसीलिए इस चौहारे का नाम क्राँति चौक रख दिया गया था. विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें क्या लागू की कि मानों विश्वविद्यालय में एक भूचाल सा आ गया. रामजस, करोड़ीमल, हिंदू कॉलेज से लेकर जुबली हॉल और ग्वायर हॉल तक के गलियारों में सिर्फ़ एक ही नारा सुनाई देता था- मंडल कमीशन हाय-हाय, मंडल कमीशन वापस जाओ. उस वक्त मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के करोड़ीमल कॉलेज में पढ़ने वाला फर्स्ट इयर का छात्र था. जाति से ब्राह्मण. लगा कि आगे की कोई गुंजाइश नहीं और इसलिए मेरे लिए अब आगे पढ़ने के कोई मायने नहीं. आंदोलन बस कूद पड़ा मैं भी इस आंदोलन में. हर जगह कक्षाओं का बहिष्कार, सड़क रोको आंदोलन. पर अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी आरक्षण के पक्ष में फ़ैसला सुना दिया था. कॉलेज से जत्थे के जत्थे निकलते थे. और इसी क्राँति चौक पर सड़क का घेराव करते थे. सड़क पर आवाजाही बंद, पूरा मॉरिश नगर बंद. पुलिस भी मुस्तैद थी. विश्वविद्यालय में धारा 144 लगी हुई थी. अक्सर छात्रों और पुलिस में मुठभेड़ होती. हम पत्थर फेंकते और पुलिस आँसू गैस के गोलों के साथ लाठियाँ भांजती. हम दिन में सड़कों पर लेटकर आंदोलन के लिए चंदा इकट्ठा करते. हमने हज़ारों रूपए इकट्ठे किए-अस्तित्व की लड़ाई के नाम पर. एक दिन पैसा इकट्ठा करने के अभियान पर था. एक व्यक्ति की गाड़ी के आगे मैं लेट गया. उठकर कुछ सहयोग राशि माँगी तो उन सज्जन ने मुझे अपनी गाड़ी में बैठाया और पैसे देने के बजाए, बम बनाने की तरकीब बताने लगे. स्टीफेंस कॉलेज के सामने आख़िरकार मैं उस गाड़ी से उतरा और कुछ सोचते हुए वापस जाने लगा. धीरे-धीरे ये आंदोलन हिंसक होने लगा था. छात्रों की भीड़ पुलिस पर अक्सर पेट्रोल बम और पत्थर बरसाती. सलाखों के पीछे चिंता एक दिन की दोपहर सभी छात्र नेता क्राँति चौक पर थे. पुलिस और छात्रों के बीच फिर से संघर्ष हुआ. पुलिस ने हम लोगों को दूर-दूर तक दौड़ाया. आख़िरकार मैं पकड़ा गया. जब पुलिस की पहली लाठी पीठ पड़ी तो पहली आवाज़ यही निकली, "मैं नहीं था." पुलिस ने लाठियाँ भाँजी और कुछ समय पहले तक मंडल कमीशन हॉय-हॉय का नारा लगाने वाला मैं चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था, "मैं नहीं था, मैं नहीं था."
चंद घंटों बाद हम थाना सिविल्स लाइंस में सलाखों के पीछे थे. ख़ैर थाने में कोई मारपीट नहीं हुई. उस समय ऐसा लगता था कि मानों कुछ पुलिस वाले भी हमारे साथ हैं. दो दिन की जेल बाद तीस हज़ारी अदालत से मेरी और मेरे साथियों की ज़मानत हो गई. हम जब लौटकर कॉलेज आए तो नेता बन चुके थे. हाथ हिला-हिलाकर फूल मालाओं के बीच मैंने लोगों का अभिवादन स्वीकार किया. लेकिन जब हॉस्टल पहुंचे तो मेरा पहला सवाल अपने साथियों से था, "वो पैसा जो हमने इकट्ठा किया वह कहाँ है." सब ख़ामोश रहे रहे. बाद में मालूम चला कि साथी उसे कमला नगर की दूकानों में खा-पीकर चट कर गए. मन में आया कि पैसा हमने इकट्ठा किया, लाठियाँ हमने खाईं, जेल हम गए, क्या इसीलिए? बहरहाल, मंडल आंदोलन धीरे-धीरे मरने लगा. क्योंकि कमंडल जोर पकड़ रहा था. और अब हम मंडल कमीशन हाय-हाय की जगह जयश्रीराम के नारे लगा रहे थे. |
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