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अफ़ग़ानिस्तान का संघर्ष भरा इतिहास-2 | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
1992 तक मुजाहिदीन ने काबुल में अपना दबदबा बना लिया और कुछ दिनों के संघर्ष के बाद प्रोफ़ेसर बुरहानुद्दीन रब्बानी देश के नए राष्ट्रपति बन गए जिसे इस्लामी गणराज्य का नाम दिया गया. लेकिन उनकी यह जीत जल्दी ही अंदरूनी लड़ाई में तब्दील हो गई क्योंकि मुजाहिदीनों में सत्ता के बँटवारे पर कोई सहमति नहीं बन पाई. सोवियत क़ब्ज़े के दौरान ज़्यादातर ग्रामीण इलाक़ों में लोगों की मौत हुई क्योंकि लाल सेना ने वहाँ से मुजाहिदीनों को बार निकलाने लिए सैनिक कार्रवाई की थी. लेकिन जब मुजाहिदीनों ने सत्ता संभाली तो उन्होंने शहरी इलाक़ों को ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा, ख़ासतौर से राजधानी काबुल पर इसका गहरा असर पड़ा. इस संघर्ष में काबुल में लाखों लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी और देश एक तरह से अराजकता के गर्त में डूबता चला गया. यह दौर था 1994 और तभी अफ़ग़ानिस्तान के दक्षिणी शहर कंधार में तालेबान एक शक्ति बनकर उभरे. कंधार को पश्तूनों का गढ़ माना जाता है. तालेबान ने शुरूआती अपील की - मुजाहिदीनों को सत्ता से हटाने की और उसे इसमें सफलता भी मिली. तालेबान का ज़माना तालेबान ने सबसे पहले पश्तून इलाक़ों पर अपना प्रभाव बनाने में सफलता पाई और इसमें उन्हें ज़्यादा लड़ाई नहीं करनी पड़ी. कुछ मुजाहिदीन कमांडर भी उनकी तरफ़ आ गए.
और जैसे-जैसे तालेबान का प्रभाव कुछ और इलाक़ों में बढ़ा, ख़ासतौर से ग़ैर पश्तून इलाक़ों में, तो लड़ाई और हिंसक होती गई. धीरे-धीरे तालेबान ने देश के क़रीब 90 प्रतिशत हिस्से पर अपना क़ब्ज़ा कर लिया. यह 1996 की बात है. उन्होंने काबुल को भी अपने नियंत्रण में ले लिया. तब अंतरराष्ट्रीय जगत ने तालेबान की कट्टर इस्लामी नीतियों पर अपनी नाख़ुशी ज़ाहिर की, ख़ासतौर से समाज में औरतों के दर्जे के मामले में उसकी नीतियों की. जैसे-जैसे तालेबान का नियंत्रण बढ़ता गया तो पश्चिमी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान में अफ़ीम की केती रोकने के लिए तालेबान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया क्योंकि यूरोप में सबसे ज़्यादा अफ़ीम अफ़ग़ानिस्तान से ही जाती रही है. ख़ासतौर से अमरीका ने 11 सितंबर, 2001 के हमले के बाद तालेबान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह सऊदी चरमपंथी ओसामा बिन लादेन को उसके हवाले कर दे लेकिन तालेबान ने ओसामा बिन लादेन को अपना मेहमान क़रार दिया.
अमरीका का आरोप था कि 11 सितंबर को न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हुए हमलों का साज़िश ओसामा बिन लादेन ने ही रची थी. उसके बाद अक्तूबर, 2001 में अमरीका के नेतृत्व वाली सेनाओं ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया जिसके बाद तालेबान के विरोधियों को उसकी सत्ता समेटने के लिए प्रयास करने का मौक़ा मिल गया. काबुल पर नवंबर तक क़ब्ज़ा हो गया और दिसंबर के शुरू में तालेबान का गढ़ समझा जाने वाला कंधार भी उनके हाथों से निकल गया. चुनावों का रास्ता पाँच दिसंबर, 2001 को अफ़ग़ानिस्तान के विभिन्न गुटों के बीच जर्मनी के बोन शहर में एक बैठक हुई जिसमें एक अंतरिम सरकार का गठन करने पर सहमति हुई. उस सहमति के बाद पश्तून अफ़ग़ान नेता हामिद करज़ई को अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में शपथ दिलाई गई.
बोन सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में हुआ था और उस सम्मेलन में हुई सहमति के आधार पर ही 2004 में अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव हुए. जून, 2002 में लोया जिरगा हुई जिसमें हामिद करज़ई को अंतरिम राष्ट्रपति चुना गया. उसके बाद जनवरी, 2004 में दूसरी लोया जिरगा हुई जिसमें नए संविधान को मंज़ूरी दी गई. अक्तूबर, 2004 में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में हामिद करज़ई ने जीत हासिल की. लेकिन उनके बारे में कहा जाता रहा है कि काबुल से बाहर उनका कम ही नियंत्रण स्थापित हो पाया है. उनकी हत्या का भी प्रयास हो चुका है. तालेबान सरकार की समाप्ति के बाद से क़बायली कमांडरों के बीच संघर्ष अक्सर होता रहा है. यहाँ तक कि तालेबान ने भी फिर से ख़ुद को संगठित किया है जिससे देश के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में सुरक्षा स्थिति ख़राब हुई है. अंतरराष्ट्रीय सेनाओं और तालेबान की लड़ाई में अनेक मौते हुई हैं. |
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