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विशेषाधिकार की दलील नामंज़ूर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात में 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों की जाँच करने वाले नानावती आयोग ने राष्ट्रपति भवन से वह पत्र माँगा है जो पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन ने दंगों के बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखा था. ग़ौरतलब है कि नारायणन ने उस पत्र में प्रधानमंत्री को कथित रूप से लिखा था कि गुजरात में दंगों पर नियंत्रण करने के लिए सेना का समुचित प्रयोग किया जाए. राष्ट्रपति भवन ने कहा था कि पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन का तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी को लिखा गया पत्र आयोग को मुहैया नहीं कराया जा सकता क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 74 (2) के तहत विशेषाधिकार के तहत आता है. न्यायमूर्ति जीटी नानावती (रिटायर्ड) और न्यायमूर्ति के जी शाह (रिटायर्ड) वाले आयोग ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति भवन संविधान के अनुच्छेद 74 की धारा 2 के तहत विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकता और पूर्व प्रधानमंत्री को लिखा गया राष्ट्रपति का पत्र आयोग को मुहैया कराने से देश की सुरक्षा को कोई ख़तरा पैदा नहीं होगा. नारायणन ने कुछ दिन पहले एक मीडिया इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने वाजपेयी से कहा था कि दंगों पर क़ाबू पाने के लिए सेना का असरदार प्रयोग किया जाए. के आर नारायणन ने बाद में आयोग को भी पुष्टि की थी कि उनके पत्र के बारे में जो ख़बरें मीडिया में आई थीं वे सही थीं. लेकिन दंगों से प्रभावित लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुकुल सिन्हा ने जब राष्ट्रपति भवन से वह पत्र एक सबूत के तौर पर मुहैया कराने का अनुरोध किया तो राष्ट्रपति भवन ने उसे विशेषाधिकार का मामला बताते हुए मुहैया कराने से इनकार कर दिया. सिन्हा ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 74 (2) के तहत विशेषाधिकार का दावा मंत्रिमंडल कर सकता है, न कि राष्ट्रपति भवन. मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर के लिए तय की गई है. ग़ौरतलब है कि गुजरात के गोधरा में एक रेलगाड़ी में आग लगाए जाने के बाद सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिनमें एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे, हालाँकि मानवाधिकार संगठन मृतकों की संख्या दो हज़ार बताते हैं. दंगों से निपटने के तरीके को लेकर गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की जाती रही है. |
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