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इसराइल-पाकिस्तान में ऐतिहासिक वार्ता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसराइल और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच पहली बार खुलकर बातचीत हुई है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी और इसराइल के विदेश मंत्री सिल्वान शेलोम के बीच तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में मुलाक़ात हुई. पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने बातचीत के बाद कहा कि उनके देश ने इसराइल के साथ संपर्क का फ़ैसला, गज़ा से इसराइल के पीछे हटने के बाद किया. वहीं इसराइली विदेश मंत्री ने इस बैठक को 'ऐतिहासिक मुलाक़ात' का नाम दिया है. हालाँकि पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने स्पष्ट किया है कि विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात का मतलब ये नहीं है कि पाकिस्तान ने इसराइल को मान्यता दे दी है. मुशर्रफ़ ने कहा पाकिस्तान इसराइल को तब तक मान्यता नहीं देगा जब तक फ़लस्तीनी राष्ट्र का गठन नहीं हो जाता. लेकिन पाकिस्तान में छह इस्लामी पार्टियों के गठबंधन मुत्तहिदा मजलिसे अमल के नेताओं ने दोनों देशों के नेताओं की मुलाक़ात का विरोध किया है और कहा है कि यह पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों और देश की नीति के ख़िलाफ़ है. बैठक से पहले पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास और सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला से बात की थी और पाकिस्तान का कहना है कि दोनों नेताओं ने पाकिस्तान के क़दम का समर्थन किया था. मुशर्रफ़ इसी महीने न्यूयॉर्क में एक प्रभावी अमरीकी-यहूदी कांग्रेस को संबोधित करनेवाले हैं जहाँ वे संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने के लिए जा रहे हैं. मुलाक़ात इसराइल और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच मुलाक़ात इस्तांबुल के एक होटल में हुई. बातचीत तुर्की की मध्यस्थता के कारण हुई. तुर्की ऐसे कुछ मुस्लिम देशों में से एक है, जिनके इसराइल के साथ कूटनीतिक संबंध हैं. मुलाक़ात के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद क़सूरी ने कहा,"पाकिस्तान गज़ा से इसराइल के क़ब्ज़ा छोड़ने को बहुत महत्व देता है और समझता है कि ये स्वतंत्र देश इसराइल के गठन की प्रक्रिया की शुरूआत है".
वहीं इसराइली विदेश मंत्री सिल्वन शेलोम ने कहा,"पाकिस्तानी मंत्री के साथ मुलाक़ात एक बहुत महत्व की बात है, ना केवल पाकिस्तान के साथ संबंध के बारे में बल्कि पूरे मुस्लिम समुदाय के साथ हमारे संबंध के बारे में." शेलोम ने उम्मीद जताई कि इस मुलाक़ात से बात आगे बढ़ेगी और पाकिस्तान के साथ उनके देश के पूर्ण राजनयिक रिश्ते क़ायम हो जाएँगे. लेकिन पाकिस्तान छह धार्मिक पार्टियों के गठबंधन मुत्तहिदा मजलिस-ए-अमल (एमएमए) ने दोनों विदेश मंत्रियों की बैठक को पाकिस्तान के राष्ट्रीय हित के ख़िलाफ़ बताया है. गठबंधन के नेता क़ाज़ी हुसैन अहमद का कहना है,"ये पाकिस्तान की उस नीति के ख़िलाफ़ है जिसपर पाकिस्तान आरंभ से ही अमल करता रहा है". इस्लामाबाद स्थित बीबीसी के एक संवाददाता ने बताया है कि इस मुलाक़ात को आख़िरी समय तक गुप्त रखा गया था ताकि पाकिस्तान के कट्टरपंथियों की विरोधी प्रतिक्रिया से बचा जा सके. 'नीति में बदलाव' पाकिस्तान ने कभी भी इसराइल को मान्यता नहीं दी है और उसका रुख़ ये रहा है कि इसराइल को मान्यता देने का सवाल फ़लस्तीनी राज्य के गठन से जुड़ा है. लेकिन जुलाई 2003 में राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने इसराइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते क़ायम करने के मुद्दे पर एक राष्ट्रीय बहस की अपील की थी.
हाल ही में पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के प्रमुख ने भी कहा था कि पाकिस्तान और इसराइल के बीच रिश्ते क़ायम होने से अरब जगत को लाभ होगा. वहीं इसराइली अधिकारियों ने भी पिछले दिनों कहा था कि ग़ज़ा से यहूदी बस्तियों को हटाए जाने पर पाकिस्तान उत्साहित था. पिछले सप्ताह ही ग़ज़ा पट्टी से यहूदी बस्तियों को हटाए जाने का काम पूरा हुआ है. ये भी बताया जा रहा है कि विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात के पहले दोनों देशों के बीच कई बार अनौपचारिक रूप से भी संपर्क हुआ है जहाँ तक पाकिस्तान के पड़ोसी भारत की बात है तो भारत ने 1992 में इसराइल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित कर लिए थे. उसके बाद से ही भारत और इसराइल ने द्विपक्षीय संबंध को और मज़बूत बनाया है और रक्षा मामलों पर भी दोनों देश सहयोग कर रहे हैं. पिछले वर्ष मार्च में भारत और इसराइल ने रडार चेतावनी प्रणाली की आपूर्ति पर एक अरब डॉलर का समझौता किया था. जानकारों के अनुसार इस समझौते पर पाकिस्तान ने चिंता जताई थी. |
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