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सरकार की नीतियों के विरोध में हड़ताल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के प्रमुख श्रम संगठनों ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की आर्थिक नीतियों के ख़िलाफ़ 29 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल का फ़ैसला किया है. इन श्रम संगठनों का मानना है कि सरकार की मौजूदा नीति ग़रीब विरोधी है. इस गठबंधन में अधिकांश वामपंथी श्रम संगठन शामिल हैं. श्रम संगठनों के बैंकिंग, बीमा, नागरिक उड्डयन और दूरसंचार क्षेत्र के लगभग 1200 प्रतिनिधियों की शनिवार को बैठक हुई. बैठक के बाद सरकार को 16 सूत्री मांग पत्र पेश किया गया. इसमें श्रम क़ानूनों के मज़दूर विरोधी रुख़ और ग्रामीण रोज़गार योजना के पूरी तरह क्रियान्वयन न करने पर नाराज़गी व्यक्त की गई. नेताओं ने तय किया है कि 29 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल आयोजित की जाएगी. इसके पहले 20 जुलाई से 20 अगस्त तक राज्यस्तर पर सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे. साथ ही 27 अगस्त से 7 सितंबर तक धरना, प्रदर्शन और रैलियाँ आयोजित की जाएँगी. 15 सितंबर को हड़ताल के लिए जनमत जागृत किया जाएगा और 29 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल आयोजित की जाएगी. सीटू नेता तपन सेन ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि सरकार मज़दूरों की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दे रही है. साथ ही वह पेंशन क़ानून ला रही है जो मज़दूर विरोधी है. इसमें कहा गया है कि 2004 के बाद नौकरी पर रखे लोगों को पेंशन नहीं मिलेगी. नाराज़गी दूसरी ओर केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल तेल की क़ीमतों में वृद्धि और आर्थिक नीतियों को लेकर खुश नहीं है. वामपंथी दलों का कहना है कि सरकार न्यूनतम साझा कार्यक्रम का उल्लंघन कर रही है इसलिए नीतियों पर बदलाव करने के लिए उस पर दबाव डालना ज़रूरी है. ग़ौरतलब है कि केंद्र की यूपीए सरकार संसद में अपने बहुमत के लिए चार वामपंथी दलों पर निर्भर है. यूपीए की प्रमुख और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत से बात की थी. वामपंथी दल भारत हैवी इलैक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (भेल) के विनिवेश के मुद्दे पर सरकार से खासे नाराज़ है. |
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