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'अफ़ग़ानिस्तान में युद्धापराध अदालत बने' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई पर ज़ोर दिया है कि उन लोगों पर मुक़दमे चलाने के लिए विशेष अदालतें बनाएँ जिन पर 1992 में भड़के गृहयुद्ध में शामिल होने के आरोप हैं. इस संगठन ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में अनेक ऐसे लोगों के नाम लिए हैं जो मौजूदा सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर हैं. इनमें मिलिशिया कमांडर अब्दुल रशीद दोस्तम का भी नाम है. ग़ौरतलब है कि अफ़ग़ानिस्तान में अप्रैल 1992 में भड़के गृहयुद्ध में हज़ारों लोग मारे गए थे. यह गृहयुद्ध सोवियत समर्थित सरकार के पतन के बाद भड़का था. उस वक़्त बड़े पैमाने पर ख़ून ख़राबा हुआ था लेकिन किसी को भी सज़ा नहीं हुई. राजधानी काबुल में किसी भी व्यक्ति से बात करें तो उसके पास दुख भरी दास्तान है. हर घर का कोई ना कोई सदस्य 1990 के दौर में हुई हिंसा का शिकार हुआ. और आम लोगों की राय ज़ाहिर करने वाले सर्वेक्षणों में बताया गया है कि बहुत से लोग अब भी चाहते हैं कि उस हिंसा में भाग लेने वालों को सज़ा दी जाए. 'डर नहीं' ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह विस्तृत रिपोर्ट दो साल के गहन शोध के बाद तैयार की है और इसमें जिन लोगों के नाम लिए गए हैं उनमें अब्दुल रशीद दोस्तम का नाम भी है. अब्दुल रशीद दोस्तम करज़ई सरकार में रक्षा मंत्रालय में महत्वपूर्ण ओहदे पर हैं. रिपोर्ट में एक अन्य व्यक्ति का नाम है लिया गया है - अब्दुल रब अल रसूल सयाफ़ जो एक इस्लामी संगठन के नेता हैं और वह राष्ट्रपति हामिद करज़ई और उनके सहयोगियों के सलाहकार की ज़िम्मेदारी निभाते हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि मौजूदा स्थिति ऐसे लोगों में क़ानून के डर का अभाव दर्शाती है जिन्होंने अतीत में हिंसा में हिस्सा लिया. संगठन का कहना है कि देश में स्थिरता और ख़ासतौर से सितंबर में होने वाले संसदीय चुनाव के नाम पर इन चिंताओं की अनदेखी की जा रही है. राष्ट्रपति हामिद करज़ई के एक प्रवक्ता ने कहा कि सरकार ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट को विस्तार से पढ़ने के बाद ही उस पर कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर करेगी. |
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