| बस्तर के जंगलों में नक्सलियों से साथ कुछ दिन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज से 20 साल पहले जब मैं छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहता था. उस नौजवान का नाम था हरी. हरी अपनी टूटी साइकल लेकर हर रोज़ मेरे पास आता था, सुबह 8 बजे. वह मुझे माओ त्से तुंग पढ़कर सुनाता था. पहले उसने मुझे किताब देकर कोशिश की, पर जब मैंने पढ़ना शुरू भी नहीं किया उसने दूसरा रास्ता अपनाया और किताब पढ़कर सुनानी शुरु की. मैं आँख मूंदकर सुनता रहता था. यद्यपि उसे पता था कि “मैं आँख मूंदकर सुन रहा हूँ.” का अर्थ यह था कि मैं आधे समय तक सोता रहता था. पर हरी ने मेरे रायपुर छोड़ने तक पूरी कोशिश की. उसी हरी का जब अचानक फोन आया तो मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं हुआ जब उसने कहा कि वह अब फ़ुलटाइम नक्सलाइट है. “अंदर” जाने का निमंत्रण मैंने उसका निमंत्रण तत्काल स्वीकार कर लिया, जिसमें वह मुझे “अंदर” ले जाना चाहता था. “अंदर” यानी जंगलों के अंदर जहाँ नक्सली सक्रिय हैं. इससे पहले भी मैंने “अंदर” जाने के एक दो असफल कोशिश की थी. एक बार और कोशिश करते हुए मैं हरी की बताई जगह पर मैं ठीक समय पर पहुँच गया. पर वहाँ पर हरी का कोई नामोनिशान नहीं था. हरी पहले तो हमेशा बिलकुल समय पर आता था... क्या इस बार भी कोई गड़बड़... या नक्सली बदल गए है? पर चिंता की कोई बात नहीं थी. हरी ने मुझे तीन समय दिए थे. 1 से 1.15, 2 से 2.15 और 3 से 3.15. पर उस चाय की दुकान पर चुपचाप बैठे समय बिताना काफी मुश्किल था. जैसे सारी आँखें मुझे घूर रही हों. मुझे पास में एक नाई की दुकान नज़र आई जहाँ से चाय की दुकान पर नज़र रखी जा सकती है. मैंने बाल कटवाने का फैसला लिया. पर दो से सवा दो के बीच भी हरी को कीई खबर नहीं. मैंने इस बार दाढ़ी कटवाने का फ़ैसला लिया. नाई के साथ मेरी कहानियाँ भी अब ख़त्म हो रही थीं. पर ठीक तीन बजे हरी नज़र आया. थोड़ा मोटा हो गया है. उसकी ट्रेडमार्क, साइकल भी नदारद थी. हरी ने कहा कि वहाँ ज़्यादा देर रुकना ठीक नहीं. उसने मुझे अगले दिन शाम तक जहाँ पहुँचना है उसका पता दिया और एक स्टेपल किया हुआ पत्र. “इसे दादा लोगों को दे देना.” अब हरी से विदा का वक़्त था. उसने पूछा “तुम हमारे आंदोलन के बारे में क्या सोचते हो?" मैंने कहा "तुम्हारा भविष्य तब तक है जब तक भारत सरकार अपनी फ़ौज नहीं बुलाती." हरी मुस्कुराया, "तुम अंदर जाओ, फिर बात करते हैं." फिर चूक गए दूसरे दिन शाम हरी के बताए ठिकाने पर जब मैं पहुँचा तो रात हो चुकी थी. मुझे कुछ देर बैठने के बाद बताया गया, “दादा लोग पिछले दो दिन से आपकी राह देख रहे थे. पर आपकी राह देख-देख कर वो लोग आज चल दिए हैं.” अब क्या करें? क्या इस बार भी पिछली बार जैसा ही होगा? मैं परेशान होता देख गृहमालिक ने मुझे रात रुकने की सलाह दी. उन्होंने कहा “आप अभी सो जाइए. हम सुबह तीन बजे फिर कोशिश करेंगे.” मैंने सेटलाइट टीवी पर न्यूज देखते हुए सोने की कोशिश की. काफी ठंड थी नींद आई ही नहीं. तीन बजे हमारा दूसरा सफर शुरू हुआ. मेरे गाइड ने हमें बताया यही समय है जब हम पुलिस की नज़र से बच सकते हैं.
गाँव में खेतों के बीच से गुज़रते हुए 5 बजे हम एक गाँव में पहुँचे. गाइड ने गाँव के कुछ लोगों को उठाया. उनकी आपस में बात हुई और वो कहीं चलने की तैयारी करने लगे. मैंने कहा मैं भी आपके साथ चलूँगा. थोड़ी देर बाद हम “दादा लोगों” के संभावित रहने की जगह पर थे. सात बजे जब हम वहाँ पहुँचे तो हमें धुआँ उठता हुआ राख नज़र आया. गाइड ने कहा, “सारी रात यहीं सोकर दादा लोग आगे चल दिए हैं,” फिर उसने कहा, “आप चिंता मत कीजिए. हम दौड़कर आगे चलते हैं. दादा लोग अधिक दूर नहीं गए होंगे.” अब मेरे पास आग के पास बैठकर इंतज़ार करने के अलावा और चारा नहीं था. मैंने वहीं बैठकर आदिवासियों के साथ बातचीत करता रहा. एक आदिवासी के पैर में कुल्हाड़ी से चोट लग गई थी. बात करते करते मुझे नींद आ गई. नंगाड़ों से सूचना लूंगी पहने एक आदिवासी ने मुझे जगाया. उसके पड़ोसी ने कहा “ये क्राँति दादा हैं, आपको लेने के लिए आए हैं.” क्राँति दादा के लूंगी के बगल से लटकते देशी कट्टे को देखकर लगा कि मैं सही संगत में पहुँच गया हूँ. क्राँति ने बताया कि वो मुझे लेने के लिए आज रात फिर से वापस उसी अड्डे पर जाता जहाँ मुझे रुकने को कहा गया था.
अब हमारा पैदल सफर शुरू हुआ. सामने क्राँति और पीछे मैं. अबूझमाड़ की पगडंडियों पर हम आगे बढ़ने लगे. क्राँति के हाथ में कंप्यूटर का एक प्रिंटर था जो मेरे पिछले गाइड ने उसे दिया था. थोड़ी देर में हमें नगाड़ों की आवाज़ सुनाई दी. हमें बताया गया कि ग्रामीणों को नगाड़े की आवाज़ से इकट्ठा किया जा रहा है. ऐसा मैंने फ़ैंटम की कहानियों में ही देखा था. उन्हें भी उसी बैठक में चलना है जिसमें हमें जाना है. हम एक गाँव भी गए जहाँ नगाड़े से इकट्ठे लोगों को देखा. बुज़ुर्ग, बच्चे, महिलाएँ पूरा गाँव वहाँ था और उन्हें बताया गया कब चलना है और कहाँ जाना है. चलते-चलते हम गाँव के लोगों से बात भी करते चलते. एक बुज़ुर्ग से मैंने पूछा सरकार बेहतर है दादा लोग? दादा लोग यानी नक्सली. उन्होंने कहा, “सरकार बेहतर है क्योंकि वो हमारे लिए कुछ कर सकती है. पर मैं तो कोई सरकार यहाँ देखता नहीं. मुझे तो सिर्फ़ दादा लोग ही नज़र आते हैं.” बंदूकें ही बंदूकें इस बीच, चलते-चलते दोपहर हो गई और अचानक झाड़ियों से कुछ लोग निकले, बंदूकवाले और मिलिट्री ड्रेस में. चारों ओर से लाल सलाम की आवाज़ आई. क्राँति बताते हैं, “अब हम मंज़िल तक पहुँच गए हैं.” मेरा परिचय कमांडर कल्पना से करवाया गया. दुबली-पतली सी आदिवासी लड़की. उम्र 30 से कम की ही होगी. कमांडर कल्पना इस दलम की नेता हैं. कैंप जंगल के अंदर नीले पोलिथिन के के शीट बिछाकर बनाया गया है.
कमांडर कल्पना ने बताया “ खाना तैयार है.” मैं पड़ोस के कैंप किचन में गया. लड़के और लड़कियाँ मिलिट्री वाला हरा ड्रेस पहनकर खाना बना रही हैं. उनकी ज़्यादातर पुरानी 303 बंदूक पेड़ों से सटाकर पास में रखी हुई हैं. कुछ ग्रामीण भी उनकी मदद कर रहे हैं. मुझे बताया गया “जब हम किसी गाँव के किनारे कैंप लगाते हैं तो गाँव के लोग बर्तन और सब्ज़ी लेकर आते हैं. अक्सर चावल हमारे पास होता है.” रेडियो किसी भी कैंप का अभिन्न हिस्सा होता है. कुछ लोग कोने में खड़े होकर एक बजे का समाचार सुन रहे हैं. हमने भोजन शुरू किया. सब्ज़ी बगैर तेल की बनाई गई थी. पर काफ़ी स्वादिष्ट थी. लाल रंग का चावल. हो सकता है कि जब भूख जोरों की लगी हो तो हर खाना स्वादिष्ट लगता हो. खाना खाते-खाते कमांडर कल्पना ने बताया कि वह बस्तर के गाँव की ही है और उसके दल का काम “बैठक तक के रास्ते की रखवाली करना है. जिससे पुलिस के लोग इस रास्ते से आगे न जा सकें.” मैंने किचन में पानी उबलते हुए देखा. मेरी उत्सुकता को देखकर कमांडर कल्पना ने बताया “पीपुल्स वार में हर कोई उबला हुआ पानी ही पीता है.” मैंने तुरंत अपना मिनरल वाटर का बोझा फेंक दिया. इतने वजन के साथ चलना काफी मुश्किल हो रहा था. अब मैंने क्राँति को अपना मिलिट्री ड्रेस पहनते देखा. मुझसे कहा गया, “क्राँति चूंकि शहर में आप लोगों को लेने गया था इसलिए उसने दूसरे कपड़े पहन लिए थे. अब क्राँति और लक्ष्मण आपको आगे ले जाएंगे.” भोजन के बाद हमारा सफ़र फिर से शुरू हुआ. जंगल और पहाड़ों के बीच. बीच-बीच में गाँव मिलते थे पर बंदूकधारी लोगों को देखकर आम ग्रामीण बिल्कुल भी परेशान नहीं था क्योंकि उनके लिए यह बिल्कुल आम सा हो चला दृश्य था. बीच-बीच में ग्रामीणों के दल भी हमें जाते हुए दिखे. हमें बताया गया कि वे भी उसी बैठक के लिए जा रहे हैं जहाँ हमें जाना है. ग्रामीण तीर-भाले और ढोल-मांदर लिए हुए चलते जा रहे थे. “हमें और कितनी दूर जाना है” मैने क्राँति से पूछा. “मुझे नहीं मालूम”. क्राँति ने बताया कि इन ग्रामीणों को भी नहीं मालूम है कि बैठक कहाँ होने वाली है. उन्हें एक किसी गाँव में पहुँचने को कहा जाता है. वहाँ पर कोई होता है जिसे पता होता है कि आगे कहाँ जाना है. इसी तरह लोग आगे बढ़ते हैं. “मुझे आपको शीघ्र एक ख़ास जगह तक पहुंचाना है. वहाँ लोगों को पता होगा कि आगे कहाँ जाना है.” पार्टी का दिया हुआ नाम चलते-चलते शाम हो गई और हम एक गाँव के बाहर तक पहुंचे. “आज रात यहीं रूकना है.” क्राँति ने बताया. सूर्य अभी भी ढला नहीं था. हमने गाँव के बाहर एक खेत पर अपना पड़ाव डाला. बगल में एक नाला बह रहा था. थोड़ी देर बाद लक्ष्मण कुछ गाँव वालों के साथ लौट आया. वो अपने साथ बर्तन और सब्ज़ियाँ भी लाए थे. इसके बाद भोजन बनाने का काम शुरू हुआ. मैंने खाना पकते ग्रामीणों से सुना की उनके गाँव से भी एक दीदी पार्टी में गई हैं और उन्हें इसका बहुत गर्व है. इस गाँव से सबसे करीब की सड़क चार-पाँच घंटे दूर है. अस्पताल, स्कूल, बिजली, सड़क इनका दूर-दूर तक कोई नामो निशान नहीं. क्राँति ने कहा. “हम यहाँ बहुत सुरक्षित हैं. पुलिस यहाँ कभी भी नहीं आ सकती.” अब धीरे-धीरे अंधेरा हो चला था. लक्ष्मण कही से ताड़ी भी ले आया. आग के करीब बैठे मैं खाना पकाते क्राँति से बात करता रहा, तो पता चला कि क्राँति नाम उसे पार्टी ने दिया है. “जब मै मर जाऊंगा तब यही नाम किसी नए कॉमरेड को दे दिया जाएगा.” उसने मुझसे कहा. “हमारे पास पार्टी के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. अगर हम हमारे समाज का भला देखना चाहते हैं तो हमे लड़ना ही पड़ेगा.” ताड़ी बहुत अच्छी थी और खाना भी. अब आग बुझा दी गई थी और हम सब अपने स्लिपिंग बैग में घुस गए. पर मैं काफी देर सो नहीं पाया यह सोचते हुए कि क्या इनके पास सच में लड़ने के सिवा कोई चारा नहीं है...? दूसरी सुबह एक बुज़ुर्ग से मैंने पूछा कि उसे क्या चाहिए, उसने कहा “हमें एक तालाब चाहिए.” कितनी सीमित ज़रुरत है इनकी. छह महीने पुरानी योजना हम अपने तीसरे गाइड तक पहुँचने के लिए चल पड़े. रास्ते में हमने माड नदी पार की. एक और गाँव हम पहुँचे जहाँ दोपहर के भोजन का बंदोबस्त किया गया. गाँव के बाहर नदी किनारे बांस के जंगल में हमने थोड़ा विश्राम किया. क्राँति के थैले से मैंने उनकी प्रत्रिका पढ़नी शुरू की. 6 महीने पहले छपी इस पुस्तिका में इस बैठक के बारे में लिखा हुआ है. मैंने सोचा हमारी पुलिस को इसकी खबर क्यों नहीं लग पाती? शाम तक चलते-चलते अब अंधेरा होने लगा था और हमारी टाँगें जवाब देने लगी थीं. तब हमें बताया गया, “हम पहुँच गए हैं. क्राँति आगे जाकर देख आएगा और अगर सब कुछ ठीक-ठाक है तो हम आगे बढ़ेंगे.” क्राँति वापस आया और थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर हमने देखा दोनों लाइन लेकर काफी सारे पीपुल्स वार के सैनिक हमारे सामने खड़े हुए थे. अंधेरे में कुछ ख़ास दिखाई नहीं दे रहा था. यह एक काफ़ी बड़ा कैंप था. थोड़ी देर में चारों ओर लकड़ियाँ जलानी शुरू हुई. हमारा परिचय अब कैंप के प्रमुख कमांडर कोसा से कराया गया. कमांडर कोसा दंडकारण्य राज्य के प्रमुख हैं, हमें बताया गया. उनकी उम्र करीब 40 साल. काफी सुडौल व्यक्तित्व. उन्होंने बताया कि 80 के दशक में वे दंडकारण्य में आए और गढ़चिरोली की राधा से उन्होंने शादी कर ली. कामरेड राधा भी आज उनके साथ इसी कैंप में हैं. रात काफी अंधेरी हो चुकी है. चारों ओर लकड़ियाँ जल रही है. ठंड काफी है और आग के पास बैठे बगैर मुश्किल है. कमांडर कोसा के पास एके-47 राइफल है. “यह हमने काफी पहले डेढ़ लाख में खरीदी थी. अब तो ये सस्ती हो गई है और अब हमारे पास ज़्यादातर असला पुलिस से लूटा हुआ है.” कमांडर कोसा ने बताया. क्राँति का एप्सन प्रिंटर और हरी का दिया हुआ पत्र अब अपने मुकाम पहुँच चुका है. कमांडर कोसा ने बताया, “हमारा दंडाकारण्य में अब तक कोई फ़्री ज़ोन नहीं है. पर हम जल्द ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी बनाने की ताक़त तक पहुँचेंगे.” मैंने सोचा अगर लिबरेटेड जोन नहीं है तब इस कंप्यूटर प्रिंटर का क्या होगा? खाना तैयार था, रोटी भी थी और चिकन भी. पर मैने पिछली दोपहर के कैंप के भोजन से इस भोजन की तुलना करना उचित नहीं समझा. सतीश एक कोने पर कंबल लपेटकर पड़े हुए थे. वे इस दलम के डॉक्टर हैं पर इस समय मलेरिया से पीड़ित हैं. कामरेड राधा जो उनके साथ नर्स का काम करती हैं उन्हें दवा दे रही हैं. पड़ोस में सोलर लैंप में काफी छोटी लड़कियों को पोस्टर बनाते देखा. उनकी उम्र 14 से 16 के बीच होगी. वे बाँस का कलम बनाकर कल की बैठक में लगाने केलिए पोस्टर लिख रही हैं. कमांडर कोसा ने बताया “उनका उद्देश्य है गाँव के लोगों के साथ एक दिन दिल्ली घेर लेना.” मैंने पूछा आप इन गाँव में सड़कें नहीं आने दे रहे हैं, तो जवाब मिला “आपकी दिल्ली में तो बहुत सड़कें हैं तो वहाँ गरीबी क्यों है? हम भी सकड़क बनाएँगे जब जनता का राज हो जाएगा.” “आंध्र प्रदेश की बातचीत तो असफल हो चुकी है, और राज्यों से प्रस्ताव मिलने पर देखा जाएगा.” आंध्र में पास से ही लोगों के गने और नागाड़ों की ज़ोरदार आवाज़ सुनाई दे रही थी. कमांडर कोसा ने बताया “ये लोग कल की बैठक में जाने के लिए आए हैं और पड़ोस में ही डेरा डाला हुआ है.” इतना शोर-शराबा, मैने फिर सोचा, पुलिस कहाँ है? यही हमारी मुलाक़ात सरोज से हुई. सरोज इंजीनियर है और काफी अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हैं. सरोज कहते हैं “इस समाज को जब तक तोड़ मरोड़कर फिर से नया नहीं तैयार किया जाता इसके सुधारने का कोई और तरीका नहीं है.” हमने पूछा इस तरह की बैठक को आप गुप्त कैसे रख लेते हैं. कमांडर कोसा ने बताया. “हमें 11 पर शक था जो पुलिस को ख़बर देना चाहते थे. हमने एक जन अदालत बुलाई. जिसमें 300 लोग इकट्ठे हुए और हमने दो को निकाल दिया.” मुझे समझने में थोड़ा वक़्त लगा कि कमांडर कोसा कह रहे हैं कि जन अदालत के फैसले के बाद उन्होंने दो को मौत के घाट उतार दिया ताकि इस आयोजन की खबर पुलिस तक न पहुंचे. अब हमने सो जाना ही उचित समझा. दूसरे संगठनों से संबंध अगली सुबह नाश्ते के वक़्त मैंने ऑल इंडिया रेडियो पर मेरे पड़ोसी पत्रकार जगदीश उपासनेजी की रेडियो समीक्षा सुनी जहाँ वे बिहार के चुनाव के बारे में बात कर रहे थे. मुझे लगा, हम कितनी दूर होते हुए भी कितनी पास हैं. अब हमें बैठक स्थल तक पहुँचने के लिए चलना था. अब हमारा दल काफी बड़ा था. सभी के सर पर बोरियाँ भरी हुई और कई लोगों के पास एके-47 जैसे आधुनिक हथियार. चलते-चलते हमारी बातचीत चलती रही. मैंने पूछा कि श्रीलंका की सरकार ने पिछले महीने मुझे कहा कि लिट्टे के पीपुल्स वार के साथ संपर्क है. उन्होंने बताया, "लिट्टे के कुछ लोग हमें प्रशिक्षण देने आए पर वे तब तक लिट्टे से निकल चुके थे. लिट्टे से हमारा कोई सीधा संवाद नहीं है." उन्होंने आगे बताया कि उल्फा जैसे संगठनों से उनके सीधे संपर्क है पर वे धर्म की राजनीति करने वाले कश्मीरी गुटों से संबंध नहीं रखते. कई पहाड़ियां पार करने के बाद हम बैठक स्थल पर दोपहर बाद पहुँच गए. पर वहां कोई ज़्यादा भीड़ नहीं थी. हमें बताया गया कि लोग थोड़ी देर में पहुँचने वाले हैं. और हमें दूर से नागाड़ों की आवाज़ सुनाई भी दे रही थी. बड़े से मैदान के बीच एक चबूतरा बना हुआ है जिसमें लाग रंग पुता हुआ है और एक कोने पर एक स्टेज है, जिसको अभी भी बनाया जा रहा है. थोड़ी देर बाद एक जनरेटर भी पहुँच गया और माइक टेस्टिंग होने लगी. इतिहास पर गर्व सरोज ने मुझे बताया “हमनें सारे रास्ते सील कर रखे हैं और पुलिस यहाँ पर सिर्फ़ हवाई रास्ते से ही आ सकती है.”
यहाँ हमारी मुलाक़ात कार्यक्रम व्यवस्था के प्रमुख पांडु से हुई. 35 वर्ष के दुबले पतले से पांडु पिछले 15 साल से दंडकारण्य में काम कर रहे हैं. हैदराबाद के पास उनके पिता काम करते हैं. और 80 के दशक में यहाँ आने के बाद पांडु फिर कभी घर नहीं गए. पांडु ने बताया कि वे स्थानीय इतिहास को लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं. “जहाँ पर यह बैठक हो रही है. यही 1910 में अंग्रेजों ने भूमकाल आंदोलन को कुचलने के लिए 10 आदिवासियों को शहीद कर दिया था. उसकी याद में हम हर साल यह कार्यक्रम मनाते हैं. हम चाहते हैं कि आदिवासियों में उनके इतिहास को लेकर गर्व पैदा हो.” नगाड़ों की आवाज़ क़रीब आ रही थी. और जब वह पास पहुँची तो बैठक स्थल एक मेले में परिवर्तित हो चुका था. हमने थोड़ी देर बाद यह गिनना छोड़ दिया कि कितने मांदर बज रहे थे और कितने लोग आ चुके थे. पहले लोग ने जुलूस के रूप में उस पेड़ का चक्कर लगाया जहाँ पाडुं के अनुसार अंग्रेजों ने आदिवासियों पर गोली मारी थी. एक आदिवासी ने लाल चबूतरे पर चढ़कर झंडा फहराया. उसके बाद बैठक शुरू हुई. पहले वक़्ता और फिर सांस्कृतिक कार्यक्रम. स्थानीय भाषा में चल रहे कार्यक्रम में हमें कुछ ज़्यादा समझ नहीं आया पर इतना ज़रूर समझ में आया कि लोग मज़े ले रहे थे. बैठक चलती रही और लोग वही बैठे-बैठे लकड़ियाँ जलाकर अपना खाना भी बनाने लगे. चारों ओर जैसे पहाड़ में आग लग गयी हो. पड़ोस के प्राथमिक शाला में हमारे सोने की व्यवस्था की गई थी. हमारे सोने के देर बाद तक भी कार्यक्रम चलता रहा. सुबह हमारे उठने के पहले सारे लोग वापस जा चुके थे. कॉमरेड फुलमति अपने दलम के साथ हमारा इंतज़ार कर रही थी जिन पर हमें वापस पहुँचाने का ज़िम्मा था. असर स्कूल के ठेके पर रखे गए गुरूजी ने हमें बताया कि “जब से दादा लोगों की बैठक का पता चला है यह ये स्कूल चालू हो गया है.” लौटते हुए कॉमरेड फूलमति ने बताया “हम लोग 10 हज़ार रुपए खर्च कर गाँव में तालाब खुदवा रहे हैं, जिसके लिए सरकार लाखों खर्च करती हैं.”
35 साल की फूलमति जो इतनी ख़ूबसूरत थी कि किसी भी छत्तीसगढ़ फ़िल्म की हिरोइन बन सकती है, उसने हमें बताया “बचपन से हम चार दोस्तों का एक ही सपना था कि जैसे ही हम 16 साल के होंगे हम पार्टी में शामिल हो जाएंगे.” फूलमति ने हमें बताया कि उसने पढ़ना लिखना दालाम में शामिल होने के बाद सीखा. उसने बताया दलम में आज 60 प्रतिशत लड़कियाँ है और 40 कमांडर लड़कियाँ हैं. बात करते-करते फूलमति ने हमें कमांडर कल्पना तक पहुँचा दिया जो बैठक के लिए रास्ते रोके अपने दलम के साथ पहरे में बैठी थी. अब फूलमति से विदा माँगकर हम कल्पना के साथ चल पड़े. पूरे दिन चलने के बाद 2 लड़कों को कल्पना ने आगे भेजा. “वो देख आएँगे सब-कुछ ठीक है फिर हम आगे बढ़ेंगे.” उन साथियों की प्रतीक्षा करते-करते कल्पना ने वही सवाल पूछा जो हरी ने पहले दिन पूछा था, आप हमारे आँदोलन के बारे में क्या सोचते हैं? मैंने उसे वही जवाब दिया जो मैं सोचता था. "30 हज़ार की आबादी में से बगैर पुलिस को ख़बर लगे अगर आप 10 हज़ार को अपनी बैठक में इकट्ठा कर लेते हों तो आपके काम को कमज़ोर समझना मूर्खता होगी, पर आपका आँदोलन तब तक ही चलेगा जब तक भारत सरकार आपको बड़ा खतरा नहीं मानती." हमारी गाड़ी आ चुकी थी और पुलिस के आसपास न होने के संकेत भी. फिर मिलने के वादे के साथ हम विदा हो गए. |
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