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मंगलवार, 07 जून, 2005 को 13:04 GMT तक के समाचार
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छोटे कंधों पर बड़ी ज़िम्मेदारी

गौतम
खेलने-कूदने की उम्र में घर के लिए सब कुछ करना पड़ता है
जिस समय दुनिया भर के बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे होते हैं, उस समय बिलासपुर के साढ़े पांच साल के सौरभ नागवंशी को राजधानी रायपुर जाने की हड़बड़ी रहती है, जहाँ उसका दफ़्तर है.

चौंक गए न! भला साढ़े पांच साल का बच्चा कौन-से दफ़्तर जाता होगा ! लेकिन ये सच है.
सौरभ नौकरी करता है और वह भी सरकारी.

जिस पुलिस और थाने का नाम लेकर बच्चों को डराया जाता है, सौरभ उसी पुलिस विभाग में बाल आरक्षक के पद पर कार्यरत है.

इस मासूम बच्चे को देख कर यक़ीन कर पाना मुश्किल होता है कि यह कोई नौकरी करता होगा.
लेकिन सौरभ को अपनी मां की ऊंगलियां और कंधे पर परिवार के पांच सदस्यों की ज़िम्मेदारी थामे 110 किलोमीटर दूर रायपुर नौकरी के लिए जाना होता है.

नियुक्ति

देश के अधिकांश सरकारी कर्मचारियों की सेवा सुविधा में आकस्मिक मृत्यु होने पर उसके किसी एक परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देने का प्रावधान है.

 घर-परिवार चलाने के लिए कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है. इतने से बच्चे से नौकरी कराना किसे अच्छा लगता है! अभी तो इसके खेलने-कूदने के दिन थे
सौरभ की माँ ईश्वरी देवी नागेश्वरी

पुलिस विभाग में भी इस नियम के तहत नियुक्ति दी जाती है, जिसके लिए उम्र का कोई बंधन नहीं है.

इस नियम के तहत अगर किसी बच्चे को नियुक्ति दी जाती है तो उसे एक दिन दफ़्तर और दूसरे दिन स्कूल जाना होता है.

कुछ मामलों में बच्चे को प्रतिदिन दफ़्तर आना होता है. आम तौर पर दफ़्तर में उनसे फ़ाइलें और चाय-पानी लाने-ले जाने का काम लिया जाता है. इस काम के बदले उन्हें लगभग ढ़ाई हज़ार रुपए वेतन दिया जाता है.

ऐसे बाल आरक्षकों के लिए 18 वर्ष की उम्र तक आठवीं-दसवीं की परीक्षा पास करना अनिवार्य होता है, जिसके बाद ही उन्हें पुलिस विभाग में स्थायी किया जाता है.

ज़ाहिर है, स्थायी करने के बाद ही इन बाल आरक्षकों को पूरा वेतन दिया जाता है. जिस उम्र में बच्चे अक्षरों को पहचानना सीखते हैं, उस उम्र में सबसे पहले वेतन के लिए अपना हस्ताक्षर करना सीखने वाला सौरभ नागवंशी हमेशा गुमसुम रहता है.

सौरभ की मां ईश्वरी देवी नागवंशी कहती हैं, "घर-परिवार चलाने के लिए कोई दूसरा चारा भी तो नहीं है. इतने से बच्चे से नौकरी कराना किसे अच्छा लगता है! अभी तो इसके खेलने-कूदने के दिन थे."

सपने

खेलने-कूदने की उम्र में अपने घरों में पिता की जगह लेने वाले इन बाल आरक्षकों के लिए खेल के मैदान केवल सपनो में ही कौंधते हैं.

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कहीं और काम करना चाहते हैं जितेश

अब मनीष को ही लें. कोरबा के एसपी कार्यालय में बाल आरक्षक के पद पर काम करने वाले 10 साल के मनीष खूंटे की दिनचर्या सुबह 6 बजे से शुरू होती है.

सुबह वह अपने दो छोटे भाइयों के साथ स्कूल जाता है और दोपहर स्कूल से लौटने के बाद उसे दफ़्तर जाना होता है.

शाम को दफ़्तर से घर लौटते समय रास्ते में खेल रहे बच्चों को देख कर उसका मन तो ललचता है लेकिन उसे तुरंत ट्यूशन जाना होता है.

फ़ुटबॉल से बेहद प्यार करने वाले मनीष के पास इतना वक़्त नहीं होता कि वह खेल के लिए समय निकाल सके.

स्कूल के दूसरे कार्यक्रमों में भी वह समय की कमी के कारण कभी भाग नहीं ले पाता. अपनी नौकरी के बल पर हर महीने 24 सौ रुपए कमाने वाले मनीष को इस बात की ख़ुशी है कि उसके सहपाठी और शिक्षक उसे “पुलिसवाला ” कह कर सम्मान देते हैं.

बड़ों जैसी बात करने वाले मनीष के हिस्से में अभी केवल ज़िम्मेदारियां है, जिसे निभाते हुए वह किसी भी तरह पुलिस इंस्पेक्टर बनना चाहता है.

मजबूरी

अधिकांश बाल आरक्षक यह काम नहीं करना चाहते, लेकिन घर चलाने की मज़बूरी उन्हें बेबस कर देती है.

 मैं यह काम नहीं करना चाहता, मैं ख़ूब पढ़ना चाहता हूं. लेकिन चार भाई, दो बहन और मां का गुजारा कैसे होगा?
गौतम

बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में पदस्थ आठवीं में पढ़ने वाला गौतम कहता है, "मैं यह काम नहीं करना चाहता, मैं ख़ूब पढ़ना चाहता हूं. लेकिन चार भाई, दो बहन और मां का गुजारा कैसे होगा?"

जांजगीर के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में पदस्थ सातवीं कक्षा में पढ़ने वाला जितेश सिंह भी जितनी जल्दी हो, इस नौकरी से छुटकारा पाना चाहता है.

वह देर रात गए तक अपने आने वाले दिनों के बारे में सोचता रहता है, जहां कई-कई सालों तक केवल दफ़्तर के कामकाज का शोर भरा हुआ हैं.

जितेश चाहता है कि उसे पुलिस विभाग की जगह अब कहीं और काम पर लगा दिया जाए.
यही हाल जानकी का है.

1994 में केवल सात साल की उम्र में सरगुजा के जानकी प्रसाद राजवाड़े को अपनी पिता की मौत के बाद पहली बार पुलिस की वर्दी पहनायी गयी थी.

तब से लेकर अब तक के 11 साल का एक-एक दिन जानकी के लिए पहाड़ की तरह गुजरा है.

दफ़्तर में चाय-पान लाना और इधर से उधर फ़ाइलें ढोना उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता. लेकिन घर की गाड़ी खींचने के लिए इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं है.

जानकी प्रसाद राजवाड़े पढ़ाई पूरी करके भारतीय पुलिस सेवा में जाना चाहता है.

लेकिन राज्य मानवाधिकार आयोग के सुभाष मिश्र कहते हैं, "मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि ऐसे बच्चों के बेहतर भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती. शरीर और मन से अपरिपक्व ये बच्चे जिस माहौल में अपना अधिकांश समय गुजारते हैं, उसमें इनके आईएएस-आईपीएस बनने की बात सपनों की तरह है."

सुभाष मिश्र का मानना है कि जब तक बच्चा बालिग न हो जाए, तब तक उसे किसी सेवा में नहीं लिया जाना चाहिए.

इसके बजाय उसके परिवार को हर महीने एक सम्मानजनक धन-राशि दी जानी चाहिए, जिससे बच्चे का लालन-पालन ढंग से हो सके और वह अच्छी पढ़ाई करके अपना करियर चुन सके.

उल्लंघन

रायपुर में रेलवे पुलिस अधीक्षक पवन देव पुलिस सेवा में बाल आरक्षकों की भर्ती को मानवीय पहलू से देखने की वकालत करते हैं.

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सौरभ तो खुल कर बात भी नहीं कर पाता

उनकी राय है कि दूसरी सरकारी सेवाओं में जहाँ अनुकंपा नियुक्ति में बरसों गुजर जाते हैं, वहीं पुलिस सेवा में तत्काल भर्ती आश्रित परिवार को बड़ी राहत देता है. वैसे भी बाल आरक्षकों से कोई ख़ास काम नहीं लिया जाता.

दूसरी ओर बच्चों के विविध मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने वाले मानवाधिकार संगठन फ़ोरम फ़ॉर फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग डाक्यूमेंटेशन एंड एडवोकेसी के अध्यक्ष सुभाष महापात्र बाल आरक्षक की अवधारणा को ही अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताते हैं.

संयुक्त राष्ट्र के जेनेवा अधिवेशन और 1959 के बाल अधिकार संबंधी घोषणा पत्र का हवाला देते हुए सुभाष बताते हैं, "बच्चों को पुलिस की वर्दी पहना कर उनसे काम लेना भारतीय क़ानून के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय क़ानून का भी उल्लंघन है. संयुक्त राष्ट्र की बाल सैनिकों की जो परिभाषा है, ये बाल आरक्षक उनसे अलग नहीं हैं."

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