|
कलयुग का राजनीतिक महाभारत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में जिस हालात और रात्रि की जिस घड़ी में विधानसभा भंग करने का निर्णय लिया गया, उससे राजनीतिक बवाल मचना तय था. हुआ भी यही है. सत्तापक्ष और विपक्ष के संबंध पहले ही कटु थे. बिहार प्रकरण इसे शत्रुता में बदलने की क्षमता रखता है. दोनों पक्षों की ओर से अपनाए गए तेवर अभी से इस बात की भनक दे रहे हैं कि बिहार में अगले विधानसभा चुनाव किस अंदाज़ और मिज़ाज में लड़े जाने वाले हैं. धाँधली और हिंसा पहले ही विधानसभा चुनावों के लिए कोई अजूबा नहीं थी. मौजूदा वातावरण इन प्रवृत्तियों को और हवा दे सकता है. सवाल इसका नहीं है कि कौन सा पक्ष सही है. सफ़ेद और स्याह में शायद इसका स्पष्ट उत्तर भी नहीं है. बात केवल नेताओं का बयानबाज़ी की भी नहीं है. बात यह भी नहीं है कि क्या लालू प्रसाद यादव के इस कथन में ज़्यादा वज़न है कि मामला जनता की अदालत में ही तय होना चाहिए या फिर अटल जी का इस प्रकरण को लोकतंत्र की हत्या बताना ज़्यादा तर्कसंगत है. न ही इस विश्लेषण का भारतीय राजनीति या लोकतांत्रिक व्यवस्था पर दूरगामी असर पड़ेगा कि कैसे पासवान हीरो से ज़ीरो बन गए और आने वाले चुनावों में उनकी स्थिति क्या होने वाली है. या फिर क्या लालू का यह तर्क कि उनके बिना बिहार में सरकार बन ही नहीं सकती, जनता के ज़्यादा गले उतरेगा या फिर विपक्ष की यह दलील और आक्रामक मुहीम उन्हें विजय दिलवाएगी कि उनके मुँह से सत्ता का निवाला साजिश और धोखे से छीन लिया गया. पर विपक्ष को साथ ही यह भी स्पष्ट करना पड़ेगा कि क्या वे वाकई विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त नहीं कर रहे थे. क्या धन और मंत्रिपद के प्रलोभन पासवान के विधायकों के हृदय परिवर्तन का कारण नहीं थे. आधुनिक धृतराष्ट्र
साथ ही कभी इंदिरा और राजीव गाँधी के विश्वसनीय रहे बूटा सिंह को भी यह स्पष्ट करना होगा कि अगर यही विधायक लालू और कांग्रेस के पास आ रहे होते तो भी क्या वह ख़रीद-फ़रोख़्त फ़ार्मूले का इस्तेमाल कर विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश करते. राजीव गाँधी के गृहमंत्री के रुप में बूटा सिंह आलाकमान के इशारे पर मुख्यमंत्री चुटकियों में बदला करते थे. ग़लत वह तब भी थे. पर कम से कम तब कांग्रेस 400 सांसदों वाली पार्टी थी. आज उनके पास सांसद तो 140 ही हैं पर रंग-ढंग वही पुराने हैं. चिंता की एक बात और है पर वह हमारे नेताओं को जैसे दिखाई ही नहीं देती. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दर्प तो 1947 से ही था. अब तो भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से भी एक है, क्षेत्रीय महाशक्ति है और सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का दावेदार भी. लोकतांत्रिक परंपराओं का निर्वहन, संवैधानिक संस्थाओं का आदर और राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को साथ लेकर चलने का प्रयास, इन सब घिसी-पिटी परिपाटियों का स्थान शायद आज के महाभारत में नहीं है. कलयुग की इस महाभारत में सबसे ज़्यादा अफ़सोसजनक एक और बात भी है. दुर्योधन और दुशासन तो हैं ही, पर धृतराष्ट्र भी अब कई हो गए हैं. झारखंड, गोवा और अब विवादास्पद ही सही, पर बिहार के संदर्भ में लिए गए निर्णय से क्या मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी पल्ला झाड़ सकते हैं? या फिर मनमोहन सिंह, जो स्वच्छ छवि और ईमानदारी के लिए भारतीय सत्ता जगत में पर्याय माने जाते हैं, इस मामले में अपने आपको बचाए रख सकते हैं, या फिर अटल बिहारी वाजपेयी, जो गुजरात के दंगों के समय धृतराष्ट्र की भूमिका बख़ूबी निभा रहे थे, की भूमिका को इस बार निर्विवाद माना जाए? जब तक ये नेता धृतराष्ट्र बने रहेंगे, भारतीय राजनीति के नायक भी कौरव राजकुमार ही बने रहेंगे. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||