BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 20 मई, 2005 को 05:11 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'अर्थव्यवस्था की मनोदशा बदली है'

वित्त मंत्री पी चिदंबरम
आशंकाओं को गलत साबित करते हुए आर्थिक क्षेत्र में प्रगति हुई
यह एक चमत्कार ही माना जाएगा. 22 मई को मनमोहन सिंह सरकार का एक साल पूरा हो रहा है.

मनमोहन सिंह नाबाद हैं और उनकी टीम का एक विकेट भी आउट नहीं हुआ है.

इस दौरान कई ऐसे अवसर आए जब लगा कि मनमोहन सिंह की टीम धराशायी होने वाली है.

वह सहवाग की तरह आक्रामक और जोखिम लेने वाले खिलाड़ी नहीं है. वह भारतीय राजनीति के सुनील गावस्कर बनकर उभरे हैं.

उनका एक ही लक्ष्य है कि लंबी पारी खेलनी है और अविजित लौटना है.

यूपीए गठबंधन की मनमोहन सिंह सरकार के विरोधियों का परम विश्वास था कि यह सरकार महीने-दो महीने से ज़्यादा की मेहमान नहीं है.

लगभग यही मनोदशा पदारुढ़ सरकार के आम समर्थकों की भी थी. लेकिन मनमोहन सिंह ने इन तमाम धारणाओं को झुठला दिया और गठबंधन के अंतर्निहित विरोधों और हितों को बेलगाम नहीं होने दिया.

कहना न होगा कि इस दरमियान मनमोहन सिंह अपनी स्वतंत्र छवि बनाने में सफल हुए और उन्होंने अर्जुन की भाँति विपक्ष ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के भारी से भारी आक्रमण को भोथरा कर दिया.

अब यह कहने वाले आलोचक गायब हो गए हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया गाँधी की महज कठपुतली हैं.

आर्थिक, विदेशी और घरेलू मोर्चे पर मनमोहन सिंह ने जिस निपुणता का परिचय दिया है, उससे देश और दुनिया के स्तर पर उन पर विश्वास बढ़ा है.

पिछले साल मई महीने में जैसे ही यह ख़बर फैली कि वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन से यूपीए गठबंधन मनमोहन सिहं के नेतृत्व में केंद्र में क़ाबिज़ होने जा रहा है, वैसे ही भारतीय शेयर बाज़ार कंपकंपा उठा और उसके छक्के छूट गए.

14 मई, 2004 को सीपीआई के एबी बर्धन का बयान आया कि विनिवेश मंत्रालय को बंद कर दिया जाएगा.

इस शेयर बाज़ार 329 अंक टूटा और 5064 अंक के स्तर बंद हुआ.

17 मई को जो अब काले सोमवार के नाम से जाना जाता है, शेयर मार्केट एक ही दिन में 564 अंक गिरा और 4506 अंक के स्तर पर बंद हुआ.

उस समय नारंगी अखबारों ने ऐसा तांडव किया कि देश की आर्थिक प्रगति, समृद्धि और उदारीकरण की नीतियाँ पाताल में पहुँच जाएगी.

बाज़ारवादियों और धनाढ्य वर्ग को भय था कि वामपंथी दल और काँग्रेस का एक बड़ा धड़ा बाज़ारवादी और कॉर्पोरेट समर्थक नीतियों का घोर विरोधी है.

इन लोगों का साफ़ विश्वास था कि विदेशी निवेश, विनिवेश उद्योग के विभिन्न क्षेत्र- दूरसंचार, ऊर्जा, बैंकिंग फाइनेंस, उड्डयन आदि में बाज़ारवादी आर्थिक सुधारों की दिशा 180 डिग्री जाएगी.

मनोदशा बदली

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि तब बाज़ारवादी आर्थिक सुधारों के जनक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने वाले थे और कॉर्पोरेट जगत के प्रबल समर्थक पी चिदंबरम वित्त मंत्री बनने वाले थे.

लेकिन सत्ता संभालने के लगभग साल भर बाद देश की मनोदशा एकदम बदली हुई है.

जो शेयर बाज़ार पिछली मई में कंपकंपा रहा था, वहीं बाज़ार कुछ दिनों पहले कुलांचे भरता हुआ 6700 के ऐतिहासिक स्तर पर जा पहुँचा.

यह बदलाव इस बात का द्योतक है कि मनमोहन सिंह वामपंथी दलों और उनके धुर विरोधी बाज़ारवादी समर्थकों को न केवल साधने में सफल रहे हैं, बल्कि उनका विश्वास भी जीता है.

मनमोहन सिंह ने प्रोविडेंट फंड में 9.5 फ़ीसदी ब्याज दर देकर जहाँ वामपंथी दलों को शाँत किया, तो बाज़ारवादी ताक़तों को दूरसंचार क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को 49 से 76 फ़ीसदी बढ़ाकर खुश कर दिया.

आर्थिक क्षेत्र के कई संकेतक इस बात की गवाही देते हैं कि अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण पाने में मनमोहन सिंह सरकार सफल रही है.

पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतों में बेहिसाब वृद्धि के बाद भी महंगाई काबू में है.

विदेशी मुद्रा रिज़र्व 113 बिलियन से बढ़कर 142 बिलियन डॉलर हो गए हैं. निर्यात दर में इज़ाफ़ा हुआ है. कर संग्रह में वृद्धि हुई. अखाद्य पदार्थों में कर्ज़ उठान बढ़ा है. औद्योगिक विकास की दर में वृद्धि हुई है.

वामपंथ के तीख़े तेवरों और बाज़ारवादी शक्तियों के भारी दबावों के बीच आर्थिक नीतियों को आगे ले जाने में मनमोहन सिंह सरकार को सफलता मिली है.

हाँ, इनकी चाल अवश्य धीमी है. प्रत्यक्ष करों में सुधार हुए हैं. टेक्सटाइल को लघु उद्योग क्षेत्र से बाहर किया है. तमाम घोर-विरोधों के बाद भी वैट प्रणाली लागू होने की दशा में है.

शिक्षा उपशुल्क से इस सामाजिक दायित्व भी निभाने के लिए सरकार ने एक बड़े फंड निर्माण कर लिया है.

इस सरकार का पहला साल विरोधी विचारधाराओं के सामंजस्य को बैठाने में ज़्यादा बीता है.

सामाजिक क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य के प्रति ईमानदारी से प्रयास करती है, तभी भारतीय लोकतंत्र में किसी चुनाव को जीतने में यह सरकार सफल हो सकती है.

कृषि और सड़क, बिजली पानी आदि की समस्याओं से निजात पाने के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता देना इस सरकार की अनिवार्यता है.

मनमोहन सिंह भारतीय राजनीति में सुनील गावस्कर बन कर उभरे हैं. सुनील न तो सहवाग जैसे आतिशी बल्लेबाज़ थे न सचिन जैसे आकर्षक और शक्तिशाली बल्लेबाज़.

लेकिन सुनील गावस्कर में लंबी पारी खेलने का अदभुत दमख़म था. उनका विकेट लेना किसी भी ब्रेटली या शैनवार्न के लिए दुष्कर कार्य था.

मनमोहन सिंह की शैली भी सुनील गावस्कर की तरह शुष्क है लेकिन शायद यह समय का भी तकाज़ा है.

इससे जुड़ी ख़बरें
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>