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आम चुनाव और अर्थव्यवस्था | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के संसदीय चुनाव में बहुत से मतदाता देश की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी राय देंगे. सत्ताधारी गठबंधन को आशा है कि अर्थव्यवस्था मतदाताओं के सामने उसके 'तुरुप के पत्ते' का काम करेगी. ये कुछ हद तक सही हो सकता है. भारत की वर्तमान स्थिति ये है कि उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. आर्थिक वृद्धि के आँकड़े जल्दी ही सामने आने वाले हैं उनसे पता चलेगा कि पिछले साल विकास दर कितनी रही, वैसे यह दर नौ प्रतिशत रहने की उम्मीद की जा रही है. आर्थिक मामले में हाल के प्रदर्शन से ये बात सामने आई है कि भारत ने पहली बार चीन और एशिया के आर्थिक रूप से प्रगति कर रहे देशों के साथ अपनी गति बनाए रखी है. इसका कुछ हद तक श्रेय कम्प्युटर सेवा और जैव तकनीक से जुड़ी कंपनियों की सफलता को जाता है. इस बीच पश्चिमी कंपनियों ने भारत में कम ख़र्च में कॉल सेंटर और अपने मुख्य दफ़्तरों के छोटे कार्यालय खोल कर रोज़गार की संभावनाएँ बढ़ाई हैं. लेकिन देश मे तेज़ी से हो रही वर्तमान आर्थिक प्रगति की व्याख्या के लिए ये सारी बातें पर्याप्त नहीं हैं. अर्थशास्त्रियों का तो कहना है कि बहुत हद तक ये कहा जा सकता है कि भारत कि अच्छी अर्थव्यस्था के पीछे भाग्य का हाथ है. आर्थिक जानकार यह संदेह भी ज़ाहिर करते हैं कि हो सकता है भाग्य दोबारा साथ न दे. पिछले साल कृषि उत्पादन अच्छा रहने की एक वजह अच्छा मानसून था. भारत की एक अरब से भी अधिक आबादी का दो-तिहाई भाग अब भी बहुत ग़रीब है. देश में बढ़ रहे नए उद्योगों और विश्वस्तर पर भारत की प्रगति कर रही अर्थव्यवस्था की चर्चा के बावजूद लोगों के जीवन मे कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है. |
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