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रेलवे को नई तकनीक की ज़रूरत: विशेषज्ञ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष आईआईएमएस राणा की राय है कि दुर्घटनाओं से बचने के लिए रेलवे को और तेज़ी से नई तकनीक अपनाने की ज़रूरत है. उनका कहना था कि रोज़ाना हज़ारों रेलगाड़ियाँ आती जाती हैं और इनकी सुरक्षा से जुड़े लगभग चार लाख कर्मचारी हर दिन अपने काम को अंजाम देते हैं. रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष का कहना था कि इसमें ड्राइवर से लेकर गैंगमैन तक शामिल हैं और वे हरी झंडी दिखाने से लेकर सिग्नल तक देते हैं. जहाँ लाखों लोग काम में लगे हों, वहाँ अच्छे से अच्छे कर्मचारी से कभी न कभी चूक होने की गुंजाइश रहती है क्योंकि सारी प्रणाली मानव संचालित है. इसका एक ही हल है कि तकनीक का इस्तेमाल किया जाए ताकि गलती की गुंजाइश को कम किया जा सके. पूर्व अध्यक्ष का मानना है कि साबरमती एक्सप्रेस की दुर्घटना में लीवरमैन, स्टेशन मास्टर या फिर ड्राइवर की गलती हो सकती है. इसमें पटरी पर एक ट्रेन खड़ी होने पर उसी पर दूसरी ट्रेन को सिग्नल दिखा दिया गया अथवा ड्राइवर ने रेड सिग्नल की अनदेखी कर दी हो सकती है. यदि इसमें 'ट्रेक सर्किटिंग सिस्टम' होता तो ऐसी गलती की गुंजाइश न होती. राणा का मानना है कि इसमें कोई शक नहीं कि रेलवे आधुनिक तकनीक को अपना रहा है लेकिन उसकी गति धीमी है. पहले पैसे की दिक्कत थी लेकिन अब वह भी समस्या नहीं रही और रेलवे को काफ़ी धनराशि उपलब्ध करा दी गई है. टकराने से बचने की अत्याधुनिक तकनीक है, ट्रेनों में 'एंडी कुलीज़न डिवाइस' लगाई जाए. नोर्थ फ्रंटियर रेलवे में ये तकनीक अपनाई जाने की शुरुआत हुई है. इसमें यदि दो ट्रेने एक ही पटरी पर आ जाएँ तो उनमें अपने आप ही ब्रेक लग जाते हैं. बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष का मानना है कि रेलवे कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है और आधुनिक तकनीक भी अपनाई जा रही है, लेकिन इस प्रक्रिया की गति बढ़ाए जाने की ज़रूरत है. |
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