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'मानो बर्लिन दीवार गिर गई' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बस अभी मुज़फ़्फ़राबाद शहर से बाहर निकली ही थी कि टूर कंपनी चलाने वाले वक़ार आमिर का कहना था, "आज का दिन तो ऐसा है मानो बर्लिन की दीवार गिर गई है." आमिर को उम्मीद है कि लोगों की आवाजाही बढ़ने से उनका कारोबार भी बढ़ेगा. ज़्यादातर कश्मीरियों को यक़ीन ही नहीं हो रहा कि यह सचमुच हो चुका है, भारत और पाकिस्तान पहले भी कई बार उत्साहजनक संकेत देकर टकराव के रास्ते पर लौट चुके हैं. जब बस मुज़फ़्फ़राबाद के टर्मिनल से निकली तो लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. अधिकारियों ने पहले कहा था कि बस के साथ किसी निजी वाहन को जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी लेकिन घड़ी में ग्यारह बजते-बजते उन्हें अहसास हो गया कि लोगों में जोश इतना है कि पूरे आयोजन को नियंत्रण में चलाना असंभव काम है. यात्रियों को लेकर बस चली तो उसके पीछे एक पूरा काफ़िला चल पड़ा, कम से कम पचास गाड़ियों की मील भर लंबी क़तार. झेलम नदी के किनारे चलते काफ़िले में शामिल पत्रकार जो शायद ही कभी चुप होते हैं, कश्मीर की ख़ूबसूरती और मौक़े की अहमियत की वजह से हमारी गाड़ी में बार-बार चुप्पी छा जाती थी. रास्ते भर राजनीति की भी चर्चा होती रही, इस बात पर लोगों का ध्यान गया कि भारत की ओर से बस यात्रा को काफ़ी महत्व दिया गया और प्रधानमंत्री ने ख़ुद आकर बस को झंडी दिखाई जबकि पाकिस्तान की ओर से कोई केंद्रीय अधिकारी या मंत्री मुज़फ़्फ़राबाद में मौजूद नहीं था. मुज़फ़्फ़राबाद वाली बस को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर (जिसे पाकिस्तान में आज़ाद कश्मीर कहा जाता है) के प्रधानमंत्री ने रवाना किया, भारत पूरे कश्मीर को हमेशा अपना अभिन्न अंग मानता रहा है और शायद इसीलिए उसने बड़े पैमाने पर आयोजन करने का फ़ैसला किया जबकि पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर को विवादित क्षेत्र माना जाए. बसों की डगरमुज़फ़्फ़राबाद से नियंत्रण रेखा तक की कुल 62 किलोमीटर की दूरी दो घंटे में तय की गई, पूरे पहाड़ी इलाक़े में बहुत कम आबादी है लेकिन हर तरफ़ बेशुमार लोग दिखाई दे रहे थे. सुबह से ही लोग ऊँची जगहों पर और सड़कों के किनारे झुंड बनाकर जमा थे और बस को देखकर हाथ हिला रहे थे और तालियाँ बजा रहे थे. सबसे यादगार वह नज़ारा था जब लोगों ने नियंत्रण रेखा के बिल्कुल क़रीब पैदल ही लगभग पचास मीटर लंबे पुल को पार किया, मीडिया के लोग इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे लेकिन फिर पूरा दृश्य बहुत ही भावुक और शांत था. और इस ख़ामोशी की वजह लोगों के भरे हुए दिल थे, उनकी आँखों में आँसू थे और वैसे भी इतिहास को बनते देखने का मौक़ा किसी व्यक्ति को ज़िंदगी में कितनी बार मिलता है. |
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