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बस सेवा से अमन की उम्मीद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा नाम अताउल्ला हांडु हैं और मैं उड़ी के हायर सेकेंड्री स्कूल में प्रिंसिपल हूँ. मुझे लगता है कि श्रीनगर-मुज़फ़्फ़राबाद बस सेवा 1947 के बाद दोनों मुल्कों के बीच संबंध सुधारने का दिशा में पहला समझौता है. इससे पहले न ताशकंद समझौता सफल हुआ और न शिमला समझौता. लेकिन आज हमें अमन की उम्मीद हो रही है. उड़ी के इलाक़े में एलओसी के नज़दीक होने के कारण में गोलाबारी से बहुत नुक़सान हुआ है. इस इलाक़े में पाँच प्रतिशत लोगों की या तो जान गई या फिर वे गोलाबारी के कारण विकलांग हो गए. अलगाववादियों के आंदोलन का असर वैसे भी इस इलाक़े में नहीं था और ऐसे में यदि ये प्रयास सफल हुए तो यक़ीनन इसका ऐसा असर होगा कि तनाव बचने वाला ही नहीं है. लोग जब अपने नाते रिश्तेदारों से मिलेंगे तो बहुत कुछ बदलेगा. मुज़फ़्फ़राबाद में मेरे बहुत से रिश्तेदार हैं और मैं भी वहाँ जाना चाहता था लेकिन मुझे तो इस बार फ़ॉर्म ही नहीं मिला. सरकार जिस तरह से फॉर्म बाँट रही है उससे तो लगता है कि हमारी बारी आते आते तक उम्र ही निकल जाएगी. इस बारे में सरकार को कुछ सोचना चाहिए और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इसके लिए मौक़ा दिया जाना चाहिए. (बीबीसी संवाददाता विनोद वर्मा से बातचीत पर आधारित) |
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