BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मोहम्मद शरीफ़ चक की अंतिम इच्छा
चक
सलामाबाद गाँव में चक के एक भाई भी रहते हैं
मेरा नाम मोहम्मद शरीफ़ चक है, मैं नियंत्रण रेखा से बमुश्किल 12 किलोमीटर दूर सलामाबाद में रहता हूँ, मुझे कैंसर है और मेरी अंतिम इच्छा है कि मुज़फ़्फ़राबाद हो आऊँ.

मैं पैदल यहाँ, सलामाबाद से अगर चलना शुरु करुँ तो चार घंटे में अपने भाई के पास पहुँच जाऊंगा जिससे मैं पिछले 55 सालों में नहीं मिल सका हूँ क्योंकि एक लकीर खींची हुई है.

मेरी बहन वहाँ रहती है उससे मिलने मैं जाना भी चाहता था लेकिन मुझे अवसर ही नहीं मिला.

मैं कैंसर का मरीज़ हूँ और चाहता था कि ख़ुली आँखों से पूरे परिवार को देख लूँ लेकिन अब लगता है कि मेरी ये इच्छा पूरी नहीं होने वाली है.

सरकार ने जिस तरह फ़ॉर्म बाँटें हैं उससे मुझे लगता है कि लोगों की ज़रुरत के हिसाब ले लोगों को फ़ायदा मिलने वाला नहीं है.

मुझे अपनी बहन की तो याद थोड़ी है क्योंकि एक बार वह वीज़ा लेकर यहाँ मुझसे और मेरे भाई से मिलने आ गई थी लेकिन दूसरे भाई और बच्चों की याद लगभग नहीं है.

संपर्क वाया इंग्लैंड

अब यह क़िस्सा क्या बताउँ कि हम कैसे बिछड़े. जब भगदड़ होती है तो कौन कहाँ जा रहा है पता ही नहीं चलता.

चक
चक के बेटे अल्ताफ़ ने सड़क के किनारे बाज़ार में कपड़े की दुकान चलाते हैं

मैं अपनी माँ और भाई के साथ इस पार आ गया और सलामाबाद में रहने लगा लेकिन मेरी बहन और भाई उधर ही रह गए.

मेरे पिता की क़ब्र भी उधर ही है.

हमारे बीच संपर्क कायम हुआ सलामाबाद में ही रहने वाले एक परिवार के ज़रिए जब चिट्ठी में उन्होंने लिखा कि तुम्हारे भाई यहाँ हैं और इस हाल में हैं.

अब भी थोड़ा संपर्क है लेकिन सिर्फ़ चिट्ठियों से जो मेरी बहन की लड़कियाँ इंग्लैंड से भेजती हैं.

दूसरी पीढ़ी

मैं रिटारयर्ड टीचर हूँ और अब बाल बच्चे बड़े हो गए हैं.

मेरे रिश्तेदार जो उस पार रहते हैं उनसे सच कहूँ तो नाता मेरा ही है क्योंकि मैं उनको जानता हूँ मेरे बच्चों के लिए तो ये सिर्फ़ बाते हैं कि उनकी एक फ़ूफ़ी उस पार रहती हैं और एक चचा हैं.

उस पार भी बच्चे सुनते होंगे कि उनके कोई दो चचा हैं और कुछ भाई बहन हैं.

लेकिन हमारे बाद न मिलने की वैसी उत्सुकता बचेगी और न उत्साह रहेगा.

कभी मिल लिए तो वह भी औपचारिकता का ही मिलना होगा.

मैं जाना चाहता हूँ और अब ये ख़ुदा ही जानता है कि मैं वहाँ जा पाउँगा भी या नहीं.

मैंने अधिकारियों को अपने स्वास्थ्य के बारे में बता दिया है और अपनी ओर से अनुरोध किया है कि वे मेरी सहायता करें लेकिन उम्मीद कम ही नज़र आती है.

सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.

(बीबीसी संवाददाता विनोद वर्मा से बातचीत पर आधारित)

इससे जुड़ी ख़बरें
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>