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सोमवार, 04 अप्रैल, 2005 को 06:41 GMT तक के समाचार
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धमकी ने डराया कई यात्रियों को

यात्रियों की सूची
यात्रियों की पूरी सूची और उनका पता-फ़ोन नंबर चरमपंथियों के पास मौजूद है
नियंत्रण रेखा के उस पार मुज़फ़्फ़राबाद में उनका आधा परिवार रहता है, वे उनसे मिलना चाहते हैं, उनका नाम बस यात्रियों की सूची में भी है...लेकिन वे नहीं जा रहे.

उन्होंने यात्रियों की सूची से अपना नाम वापस ले लिया है.

और यह निर्णय इम्तियाज़ ने फ़ोन पर अलगाववादियों के एक संगठन की ओर से मिली धमकी के बाद उठाया है.

तीन हज़ार लोगों में से जिन तीस लोगों को आवेदन पत्र मिला और फिर जिन 29 लोगों को यात्रा की अनुमति मिली उनमें इम्तियाज़ भी एक थे. लेकिन अब वे यात्रा नहीं कर रहे हैं.

वे कहते हैं, “इसका मतलब यह नहीं है कि मैं डर गया. मैं धमकियों से नहीं डरता लेकिन मेरा परिवार भी है और ज़िम्मेदारियाँ भी तो हैं.”

हालांकि उन्होंने बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए अपनी तस्वीर खिंचवाने से इनकार कर दिया.

 इसका मतलब यह नहीं है कि मैं डर गया. मैं धमकियों से नहीं डरता लेकिन मेरा परिवार भी है और ज़िम्मेदारियाँ भी तो हैं

ये ठीक है कि इम्तियाज़ के पास सुनाने के लिए ऐसी भावुक कहानी नहीं है जिसके चलते वे बिना किसी की परवाह किए भी नियंत्रण रेखा पार करते लेकिन मुज़फ़्फ़राबाद जाना उनके लिए भी एक सपने की तरह ही था.

मूल रुप से बारामूला के रहने वाले इम्तियाज़ बताते हैं कि बँटवारे में उनके पिता का परिवार बँट गया था और उनके पिता के कुछ भाई इस ओर रह गए और कुछ उस ओर रह गए.

पिता और उनके दूसरे भाई तो वाघा के रास्ते अपने रिश्तेदारों से मिलने आते जाते रहे लेकिन बच्चों को कभी अपने चचेरे भाई बहनों से मिलने का मौक़ा ही नहीं मिला.

मक़सद

फिर वे अपनी पढ़ाई से कृषि के शोधार्थी हैं. उन्होंने सुन रखा है कि मुज़फ़्फ़राबाद में कई फ़सलों की उन्नत नस्लें हैं और वे उन्हें यहाँ लाकर अपने इलाक़े की फसल सुधारने के लिए काम करना चाहते थे.

वे दोनों ही कारणों से वहाँ जाना चाहते थे. उन्होंने आवेदन भरा और उनका नाम सूची में भी आ गया लेकिन फ़ोन आ गया.

 मुझे अपने पिता के मरने पर इतना दुख नहीं हुआ था जितना आज हो रहा है

उन्होंने बताया, “दो दिनों पहले किन्हीं नासिर साहब का फ़ोन आया और उन्होंने कश्मीरी भाषा में विनम्रता से कहा कि मुझे बस में नहीं जाना चाहिए क्योंकि यह मेरे और मेरे परिवार के लिए अच्छा नहीं है.”

इम्तियाज़ नौजवान हैं और उन्होंने कश्मीर के ख़ूनख़राबे को अपनी नज़रों से देखा है.

वे बताते हैं कि धमकी देने वाले ने कहा, “इस बस में किसी भी कश्मीरी को नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे उस मिशन को नुक़सान पहुँचता है जिसके लिए एक लाख बीस हज़ार कश्मीरी नौजवानों ने अपनी जान गँवा दी. हमने बस सेवा शुरु करने के लिए मिशन शुरु नहीं किया था.”

इम्तियाज़ के अनुसार उनसे कहा गया कि वे सरकार से बस नहीं कुछ और माँगना चाहते हैं.

इस धमकी के बाद से उनका पूरा परिवार इम्तियाज़ की बस में यात्रा करने के ख़िलाफ़ हो गया है.

वे बताते हैं, “मेरी माँ कहती हैं कि यदि मैं इस बस से गया तो वे आत्महत्या कर लेंगी.”

पिछले पंद्रह सालों में अपने परिवार के आठ लोगों को हिंसा में गँवा चुकी माँ अब अपने बेटे को नहीं गँवाना चाहती.

और बेटे ने अपनी माँ की बात मान ली है लेकिन वे कहते हैं, “मुझे अपने पिता के मरने पर इतना दुख नहीं हुआ था जितना आज हो रहा है.”

शायद इम्तियाज़ की बातें दोनों ओर की सरकारें भी सुन रही होंगीं.

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